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Friday, April 17, 2020

मतलब की दुनिया

ब्यार बही मन उड़ा, काफ़िर अब क्यूँ रोता है ?
निर्लज्ज, नालायक मन, क्यूँ उसमें खोता है ?

सारे रिश्ते उसने भुला दिये, पता नहीं क्यूँ ?
क्यूँ आँखों में भर नींद उनकी, स्वप्नों में सोता है ?

चाह क्या है मेरी, उनको इससे क्या लेना |
पलकों पे सजा चाह उनकी, बस वोही तो होता है ||

तेरे इरादे ना समझा, पर मेरे इरादे तू समझ गई |
मुकर गई हर बात से, क्या तू स्वार्थ का झरोटा है ?

दिल तोडा तूने, दर्द हुआ, उस ग़म को तू क्या जानेगी ?
'आज़ाद' प्यार ना दुनिया में, मतलब में सब होता है ||

Wednesday, April 15, 2020

तेरी ख़ामोशी

तेरी ख़ामोशी मुझे, बहुत परेशान करती है |
झूठ ही कह दे, कि तू मुझसे प्यार करती है ||

मुस्कराने का तमाशा, अब ना होगा मुझसे |
ये बिचारी दुनिया, जो मुझे बिंदास समझती है ||

ये तू ही है, जो मुझे बदल रही है |
वरना जिंदगी अपनी तो, सूनेपन में ही रहती है ||

तूने देखा ना कभी, तूने पहचाना ना कभी |
मेरी नज़रों में बस तू ही, तू ही तू दिखती है ||

फांसले बहुत है, कैसे कहूँ तुझे दिल की बात|
'आज़ाद' बस समझ ले तू, मेरी सांस तुझसे ही बहती है ||  

Monday, April 6, 2020

ये रात

चाँद भी निकला है, तारे भी हंस रहे है |
इस शांत रात में, हम क्यूँ तड़फ रहे है ?
हम थे ही अकेले, इससे दुःख क्यूँ हुआ ?
हर आहत अपनी है, अँगारे हृदय में जल रहे है ||

आज की ये रात, बढ़ती ही जा रही है | 
गैरों के लिए जिंदगी, ढ़लती ही जा रही है ||
छिपाते है ख्वाब तो, ये दिल जल  उढ़ता है |
बताने पर हर ख़ुशी, मरती ही जा रही है ||

विस्तृत चाँद के प्रकाश में, मधुर ब्यार बहती है |
जब छूकर निकलती है, हर दर्द बयाँ करती है ||
नहीं ये दर्द नहीं है, मेरे प्रियतम के हृदय का |
कह दो झूठ बोला, वो अब भी प्यार करती है ||

ये रात बड़ी शांत है, जरा खुद को समझ लू मैं |
कोई नहीं यहां मेरा, क्यूँ न अब समझ लू मैं ||
बिसरा दिया जगत ने, क्यूँ किसको याद रखूँ |
हकीकत से था दूर, सच्चाई को समझ लू मैं ||

ऐ रात! ढल ना अब, मैं विरह का सताया हूँ |
सुमधुर मिलन की आस, आतप को ही पाया हूँ ||
उम्मीद की थी उनसे, अनगिनित गम ही मिले |
'आज़ाद' न चाह सुबह की, जिंदगी से ही खफा हूँ || 

Sunday, December 30, 2018

फिर से ...



डूबा था इश्क में इतना, कि कोई गुजारिश ही न बाक़ी रही |
चाहा था तुझे इतना, कि कोई चाह ही न बाक़ी रही ||

मिला था बहुत सुकून, तेरे इश्क में डूबने का |
पर अब इश्क के नाम से ही, नफ़रत सी हो गयी ||

जलाया था दिल कई दफ़े, बहुत तरह से तूने |
पर अब दिल जलाने की, कोई वज़ह न रह गयी ||

फख्र था तुझको बहुत, कि तुझ पर मर मिटा हूँ मैं |
वो वक्त ही मदहोश था, बस यूही गलतफहमी हो गयी ||

झलकें थे आँसू कई दफ़े, तेरी याद में रह रह कर |
"आज़ाद" इन आँखों में अब, कोई तमन्ना ही न रह गयी ||


Monday, September 12, 2016

अब कहने दे...


आज इन प्यासी आँखों को, देखने दे।
मौहब्बत न सही, इस पल को गुजरने दे॥
ना छुपा चेहरे को, वक्त थम जायेगा मेरा;
उदास है जिंदगी, कुछ पल तो महकने दे॥
तुझे चाह के क्या, कोई गुनाह हो गया?
ना चाह मुझे पर, मुझे तो जी लेने दे॥
धड़कने क्यों बदहाल है, तुझे न देखने से?
मजबूरियाँ होंगी तेरी पर, मुझे तो समलने दे॥
यादों के जख्म सी सीकर, थक गया हूँ मैं।
'आज़ाद' बस तेरे प्यार में, इसको अब कहने दे॥   

Sunday, September 11, 2016

ये दुनिया तुझ में ही...


सिलसिले चलते रहे, और हम जलते रहे।
वो दूर से ही देखकर, मुस्कराते रहे।।
करीब से ना गुजरना था हमे उनके,
हम याद में रोते रहे, और वो बस हँसते रहे॥

निगाहें मिलाने की कीमत, चुकानी थी हमे।
दिले दरिया में डूबने की कीमत, चुकानी थी हमे।
हम उलझ गए थे प्यार के जाल में,
स्वप्न देखने की कीमत, चुकानी थी हमे॥

बहुत किये वायदे हमने, पर हम निभा ना सके।
आँखों से अश्क गिरे, पर उनको बता ना सके॥
दर्द-इ-तन्हाई में जलते रहे, गैरों की तरह;
वो अनजान बनते रहे, और हम कह ना सके॥

तुझे मेरी हकीकत पता है, फिर कुछ बोलती क्यों नही?
मैं गुजर रहा इस दौर से, ये ख़ामोशी तोड़ती क्यों नही?
साँसे जा रही है मेरी, इनको वापिस नही चाहता अब;
'आज़ाद' दुनिया तुझ में ही, जग की रस्मे छोड़ती क्यों नही?

आँखों में नमी होनी चाहिए...


शुष्क है माटी के कण, जल प्रवाह होना चाहिए।
ऊष्ण होते हृदय ग़म पर, अश्रु प्रवाह होना चाहिए॥
ठग लिया जिसको जगत ने, वो चंद साँसे जी रहा;
अपना नही इन्सान के वास्ते, ग़म प्रवाह होना चाहिए॥

भूलते है जो दर्द देकर, सजा उनको होनी चाहिए।
मेरे लिए न सही पर, आँखों में नमी होनी चाहिए॥
अनमोल जिंदगी कतरों पर, पल पल इसे जो लुटा रहा;
करुण रुदन किसी विरही का, इंसानियत भी रोनी चाहिए॥

बिताया वक्त साथ में, वो ख्वाब पूरे होने चाहिए।
तलाशा जिसे रग रग में, वो स्वप्न पूरे होने चाहिए॥
अपनी जिंदगी को उड़ाया, गफ़लत की दुनिया में;
तीर पर आकर खड़ा हूँ, कुछ किनारे तो होने चाहिए॥

डूबता है कोई इश्क में तो, अश्कों की कीमत होनी चाहिए।
प्यार के पवित्र बंधन में, हर दुआ शामिल होनी चाहिए॥
मेरी साँसे तेरी हो गई, ये अहसास तुझे समझना चाहिए;
जिंदगी विरह में दीरघ भई, अंतिम ख़ुशी तो होनी चाहिए॥

ख्वाब टूटे जिस पल में, उस पल को होना ना चाहिए।
फासले बढ़े रिश्तों में, उन रिश्तों को समझना चाहिए॥
वक्त गुजरता है किसी की याद में, क्या तुझे मेरी याद ना आती है?
ये विरह तड़फाता 'आज़ाद' को, क्या प्यार कभी होना ना चाहिए?

Tuesday, July 21, 2015

तो जानोगे


क्या हाल है मेरा, तेरे से दूर रहकर;
कभी करीब से देखोगे, तो जानोगे ॥
तुम्हे मेरी आँखों में, नमीं नहीं दिखती;
कभी दिल के रास्ते आओ, तो जानोगे ॥
तुम्हे शिकायत मेरे, लब्ज न बोलने से है;
मेरी धड़कन की भाषा समझोगे, तो जानोगे ॥
तुम्हारी जुदाई मुझे, कितना तड़फाती है;
कभी तन्हा रहोगे, तो जानोगे ॥
मैं रिश्तों के बंधन से, कायर हो गया हूँ;
कभी रिश्तों को मानोगे, तो जानोगे ॥
तेरा कहना मुझे बाँहों में, समाया नहीं कभी;
'आज़ाद' वक्त को गुजरने दे, तभी तो जानोगे ॥ 

Saturday, July 18, 2015

बुफे की दावत*

आप माने या न माने,
पर हमारे लिए सबसे बड़ी आफत ।
बुफे की दावत ॥
एक दिन हमें भी, जाना पड़ा बारात में ।
बीबी बच्चे थे साथ में ॥
सभी के सभी बाहर से शो पीस, मगर अंदर से रूखे थे ।
मगर क्या करे भाई साहब, सुबह से भूखे थे ॥
जैसे ही खाने का संदेसा आया हाल में ।
भगदड़ सी मच गयी पंडाल में ॥
एक के ऊपर एक बरसने लगे ।
जिसने झपट लिया तो झपट लिया, बाकी के खड़े तरसने लगे ॥
एक व्यक्ति हाथ में प्लेट लिए, इधर से उधर चक्कर लगा रहा था ।
खाना लेना तो दूर उसे देख भी नहीं पा रहा था ॥
दूसरा
अपनी प्लेट में चावल की तश्तरी झाड़ लाया था ।
उससे तो कही ज्यादा, अपना कुर्ता फाड़ लाया था ॥
तीसरी
एक महिला थी जो ताड़ के वृक्ष की तरह तनी थी ।
उसकी आधी साड़ी तो, पनीर की सब्जी में सनी थी ॥
उसे बार बार धो रही थी ।
पड़ोसिन की पहन कर आई थी, इसलिए रो रही थी ॥
चौथा
बेचारा गरीब था, लाचार था ।
इसलिए कपडे उतार कर, पहले से ही तैयार था ॥
पाँचवा
अकेले ही सारे झटके झेल रहा था ।
भीड़ में घुसने से पहले, डंड पेल रहा था ॥
झठा
कल्पना में ही खाना खा रहा था ।
प्लेट दूसरे की देख रहा था, मुंह अपना चला रहा था ॥
सांतवें
का तो मालिक ही रब था ।
प्लेट तो उसके हाथ में थी, मगर हलवा गायब था ॥
आंठवा
इन हरकतों से बहुत ज्यादा परेशान था ।
इसलिए उसका बीबी बच्चों से ज्यादा, प्लेट पर ध्यान था ॥
नवां
अजीब हरकते कर रहा था ।
खाना खाने की बजाय, अपनी जेबों में भर रहा था ॥
दसवाँ
स्वयं लड़की वाला था, जिसके प्राण कंठ में अड़े थे ।
घराती तो सारे जीम रहे थे, और बाराती बेचारे सडकों पर खड़े थे ॥
अंत में देखते हुए ये हालत ।
हमने पत्नी से कहाँ 'डियर', लौट चले सही सलामत ॥
सुनते ही वो बिगड़ गयी ।
पता नहीं, किस बेफकूफ के पल्ले पड़ गयी ॥
इससे अच्छा तो किसी पहलवान से शादी रचाती ।
तो कम से कम, भूखी तो न मारी जाती ॥
पर इससे शादी रचा के, आज तक अपने आप को कचोट रही हूँ ।
जिंदगी में पहली बार, किसी दावत से बिना कुछ खाए लौट रही हूँ ॥  

Wednesday, July 1, 2015

बस जी रहा हूँ हसरतों को दबाके


मैं दूर तुझसे हो रहा हूँ, सिर्फ तेरी ही ख़ुशी के लिए ।
प्यार तो अब भी है तुझसे, बस जी रहा हूँ हसरतों को दबाके ॥

हर गिरते हुए तारे से, ख़ुशी तेरी ही मांगता हूँ ।
पागल मन अब भी रोता है, बस जी रहा हूँ हसरतों को दबाके ॥ 

शहर की गलियां खाली है, मकानों से कोई आवाज नहीं आती ।
शायद मैं सूनेपन के आगोश में हूँ, बस जी रहा हूँ हसरतों को दबाके ॥

कोई दूर बाग़ में बैठ चहकता है, तो किलकारियाँ मेरी निकलती है ।
सावन में भींगा मौसम नीरस, बस जी रहा हूँ हसरतों को दबाके ॥

अब कोई स्वप्न ना देंखू कभी, नींद को ठुकरा रहा हूँ मैं ।
पर दिन के उजाले में भी स्वप्न है, बस जी रहा हूँ हसरतों को दबाके ॥

गुजरती हवा पास से मेरे, मेरा अंग अंग दुखाती है ।
'आज़ाद' ये प्यार है क्या आखिर? बस जी रहा हूँ हसरतों को दबाके ॥ 

तू समझती क्यों नहीं ?


कहीं तुझे याद करते करते, अपनी जान ना दे दूँ मैं ।
तुझसे प्यार हो गया है मुझे, तू समझती क्यों नहीं ?

और भी है इंसान जहाँ में, तूने आसानी से कह दिया ।
पर उनके लिए आँसू नहीं आँखों में, तू समझती क्यों नहीं ?

माना तेरी मंजिले अलग है, मेरे रास्ते भी जुदा है ।
दूर रहकर तो प्यार और भी बढ़ता है, तू समझती क्यों नहीं ?

जिंदगी का पहला अहसास, इसने मुझे बहुत सताया है ।
ये दर्दमयी तड़फ काटती है मुझे, तू समझती क्यों नहीं ?

मेरी हर सांस में तेरी याद है, इसको कैसे हटाऊँ मैं ?
तेरी याद रोकूँ या अपनी साँस, तू समझती क्यों नहीं ?

ये जिस्म की नुमाइश नहीं है, ये प्यार का घर बना है ।
'आज़ाद' बस तुझमें खो गया है, तू समझती क्यों नहीं ?

Sunday, May 24, 2015

अब कोई ग़म नहीं


ये ब्यार बहती हुई,
मदमस्त सी मदमाती सी ।
धीरे से पास से गुजरती है।
अंग अंग मचलती है ॥
न छू मेरे तन को,
मुझे कुछ कुछ होता है ।
दो पल जीना चाहता हूँ ।
अंगों को शिथिल मत कर ।
बह मेरे से हटकर ॥
ये चिरकाल की तन्हाई ।
क्यूँ मेरे पास आई ॥
बिसरा दूंगा सब ।
पूछना मत कब ॥
चलती सांसे,
धीरे धीरे सुलगती है ।
दर्द-इ-विरह में जलती है ॥
न सोचूंगा उन कमजोर पलों को,
जिन्होंने जिंदगी तबाह कर दी ।
मौत को बुला लिया ।
दीरघ ग़म में सुला दिया ॥
कोई इन वासनाओं को हटाओ ।
मैं इनमे नहीं उलझा था ।
पर मैं तो काफी सुलझा था ॥
छोड़ दी वो बातें,
फिर तेरी याद मेरे पास क्यूँ आई ॥
जिंदगी जीने चला था ।
कुछ ही पल तो रुका था ॥
उन ही में ठगा था ॥
अब सब खामोश क्यूँ है ?
मेरे में ही आगोश क्यूँ है ?
यहाँ कोई नहीं दीख रहा ।
मैं अकेला ही घूम रहा ॥
मैं शून्य में खो रहा ॥
ईश्वर, इन विचारों को रोक ।
आँखें क्यूँ बंद हो गई ?
सांसे भी थम गई ॥
मैं शांति से चिर निद्रा में लीन हूँ ।
'आज़ाद' अब न मैं ग़मगीन हूँ ॥
अब न मैं ग़मगीन हूँ ॥  



Sunday, May 10, 2015

काश हम ये समझते


वो हमारे न थे, हम क्यूँ उन्हें अपना समझते ।
काश हम ये समझते, काश हम ये समझते ॥

वो गुजरे न कभी, जिन रास्तों पर हम टहलते ।
काश हम ये समझते, काश हम ये समझते ॥

वो हारे न कभी, हम जीत के लिए तरसते ।
काश हम ये समझते, काश हम ये समझते ॥

उन्हें जाना था दूर, हम क्यूँ ख्वाब पकड़ते ।
काश हम ये समझते, काश हम ये समझते ॥

वो चाहते भूल जाना, हम क्यूँ उन्हें याद करते ।
काश हम ये समझते, काश हम ये समझते ॥

वो जाने न इस प्यार को, फिर हम क्यूँ तड़फते ।
काश हम ये समझते, काश हम ये समझते ॥

कौन हूँ मैं उनका, वो बार बार ऐसा क्यूँ कहते ।
काश हम ये समझते, काश हम ये समझते ॥

पुष्प खिलते है सब, पर सारे नहीं महकते ।
काश हम ये समझते, काश हम ये समझते ॥

'आज़ाद' दुनिया अच्छी है, जहाँ हम विरह में रहते ।
काश हम ये समझते, काश हम ये समझते ॥

Saturday, May 2, 2015

उफ़ ये जिंदगी


हम खोजते रहे जिंदगी को, जिंदगी हमें धोखा देकर निकल गई ।
हम देखते रह गए रास्तों को, जिंदगी रास्ता बदलकर निकल गई ॥
बड़ी मुश्किल से मनाया था मन, अब के जिंदगी को समझकर रहूँगा ।
ना समझ था ना समझ ही रह गया, अब के तो जिंदगी पूरा मारकर गई ॥

रोते रहे रातभर सोते रहे ख्वाब में, जिंदगी ने ये खेल क्यूँ खेला ?
किसी की चहकती किलकारियों को, चढ़ती ताउम्र तन्हाई में क्यूँ धकेला ?
उस जिंदगी के वास्ते जी रहा था, अब किस जिंदगी के वास्ते जी रहा हूँ ?
क्यूँ तड़फ रहा चिर विलाप में, कल भी था अकेला आज भी हूँ अकेला ?

कुदरत के वास्ते तू रोना मत कभी, जिंदगी के वास्ते कुछ कहना मत कभी ।
ये दर्दमयी संसार उकसाए बार बार, जिंदगी के वास्ते इसमें तू रहना मत कभी ॥
खोजते है अपने से उदास चेहरों को, शायद ये भूलने को हम अकेले रह गए है ।
पर ना ढूँढा उस रहमत को जिसने सिखाया, जिंदगी को फासलों में ढहना मत कभी ॥

ऐ जिंदगी मेरे सवालों के जबाब तो दे, मेरे खालीपन के अहसासों का हिसाब दे ।
अब तो तेरी हर चाल कामयाब हो गई, मेरी शहादत पर दर्द-इ-विरह का खिताब दे ॥
इस जिंदगी ने हर आरज़ू को पल में समेटा, हम थमे नहीं और जिंदगी काट कर गई ।
इन साँसों के बोझ तले जिंदगी दफ़न कर दी, 'आज़ाद' अब कफ़न से हमे नबाज दे ॥

Tuesday, April 21, 2015

अच्छे लोग


कुछ लोग बहुत अच्छे होते है,
तभी तो उनसे लगाव हो जाता है।
जिंदगी तो कट ही जानी है किसी तरह,
पर उनके बिना आँखों में सैलाव हो जाता है॥

चाहते है बार बार भूल जाना उनको,
शायद उनकी ख़ुशी के लिए ही ये करते है।
उनकी यादें उनकी बातें भूल नहीं पा रहा हूँ,
'आज़ाद' ना चाहकर भी उन्हें क्यूँ याद करते है॥

छिपाये थे गम बहुत उनके जाने के बाद,
पर हमको अहसास हो गया हम उन पर मरते है।
लब्जों को तो होठों से सींकर रख लिया था,
पर नैन भी तो दिल की जुवां ब्यान करते है॥

उनकी हरकतें ऐसी, कि उनमे मैं खो गया।
उनकी मधुर आवाज ऐसी, उसमे तो मैं सो गया॥
उनका प्यार से मुस्कुरा के, पीछे से पलट के देखना।
उनके जाने के बाद, मैं तो बस रो गया॥

तक़दीर में जो लिखा है, बस वोही मिलेगा।
प्यार सच्चा हो तो, सारा जहाँ भी खिलेगा॥
 ईश्वर सही सलामत रखे, ऐसे अच्छे लोगों को।
'आज़ाद' की दर्द भरी आहों से, रब भी हिलेगा॥


Sunday, April 19, 2015

वो चला गया


आज मन फिर से उदास हो गया है।
जैसे कोई अपना बिछुड़ गया है॥
जिंदगी ने फिर से ये अनुभव करा दिया है,
बहुत दिनों के बाद, दिल फिर से रो गया है॥

उन बीते पलों को ही, बार बार याद करता हूँ।
नहीं चाहता फिर भी, बार बार मरता हूँ॥
अब ये यादें वो बीते लम्हे, घड़ी घड़ी मारते है,
इन बारिश की बूंदों में भी, दिल-इ-विरह में जलता हूँ॥

मैं चाहता क्या था तेरे से, मुझे नहीं पता।
मैं देखता क्यों था तुझे, मुझे नहीं पता॥
कभी जिंदगी को करीब से, इतना खामोश नहीं देखा था,
मैं पल पल क्यों याद करता हूँ तुझे, मुझे नहीं पता॥

 मैं इतना बदहाल हूँ कि, शब्दों से भी डरने लगा हूँ।
उन शब्दों की ओट में, कुछ का कुछ करने लगा हूँ॥
कहीं ऐसा न हो जाये कि, नफ़रत की बयार में बह जाऊं मैं,
'आज़ाद' प्यार को समझा न कभी, फिर से इसमे क्यूँ मरने लगा हूँ॥  

फिर से.....


इस चेहरे पर मुस्कान ना लाया करो,
कहीं प्यार का दरिया दिल में उफन ना जाये।
डरते है आँखों में नमी न आये फिर से,
लब्ज होठों पर आते आते कहीं ख़्वाब दफन ना जाये॥

तेरे दिल की चाह मुझे पता नहीं है,
पर मेरे दिल के अरमान बढ़ गए है।
बेचैनियाँ बढ़ाने की गलती नजदीक से ना करना,
तेरे बिना हम न रहे, हम जिद पर अड़ गए है॥

मान लिया है उनको अपना, जो शायद हमारे न है,
ना देखो अब मुड़कर मुझे, याद बहुत आते हो आप।
फिर से ये वक्त मुझे परेशान कर रहा है,
मैं बिखर जाऊंगा तब, इन सिलसिलों से जाते हो आप॥

कभी करीब से तो देख लो, इन प्यासी आँखों को।
कभी अहसास तो कर लो, इन सुलगते अरमानों को॥
हम जिंदगी की दहलीज पर, खड़े हो गए है शायद,
पहले आना फिर जाना, कहीं तोड़ न दे पैमानों को॥

ना जाना कभी हमें, इस हाल में छोड़कर,
ये हाल भी तो तूने ही बेहाल किया है।
तेरे कहने से बहाये थे गम में अश्क,
'आज़ाद' जिंदगी को तूने, कितना मुश्किल कर दिया है॥  

Wednesday, April 8, 2015

कल वो जायेगा


आजकल बैचेनी का आलम सताने लगा है मुझे।
कल से हो जाऊंगा तन्हा, डर सताने लगा है मुझे॥
तेरी एक मुस्कराहट के लिए, मैं परेशान रहता हूँ,
कल के बाद कैसे रहूँगा मैं, याद आने लगा है मुझे॥

देखते है तेरा रास्ता, शायद उससे तू गुजर जाये ।
बिन कहे लब्जो से, आँखों में कोई बसर जाये॥
कल आँखों में नींद भी ना हो, ना कोई आशा होगी,
डरते है जिस ग़मों की दुनिया से, शायद वो पसर जाये॥

कभी ना चाहा तुझे दुःख दे, इसलिए दूर से देखते रहे हम।
कभी ना जाना था प्यार क्या है, अब अहसास कर गए हम॥
दुआ है मेरी खुदा से, तुम कहीं भी रहो सदा खुश रहो,
ये आँखें तुम्हे देखने की कीमत चुकायेंगी, जब आंसुओं से भींग जायेंगे हम॥

विरह का मतलब ना जाना था कभी, वो भी अब जान चुके।
पल पल तुझे देखे बिना चैन ना मिले, ये भी अब मान चुके॥
दिल तो नहीं चाहता कि तू कभी जाये इन आँखों से दूर,
'आज़ाद' पूछा क्यों ना कभी उसने, क्या मेरे लिए कभी साँस रुके॥

Tuesday, June 11, 2013

विरह मे…

तेरी शरारत मुझे जीने न दे,
क्योंकि तेरी नज़रों में मेरा आशियाना हो गया है ।
मेरे होठों से लब्ज निकले या न निकले,
पर दिल मेरा भी तो सयाना हो गया है ॥
तुझे मैं कैसे न पसंद करूँ ?
तूने ख्यालों में मेरे घर बना तो लिया ।
तूने कहा न पसंद करती है मुझे,
 पर इशारों ने तेरे सच बता तो दिया ॥
तेरा चुपके से धीरे से मेरे तन को दबाना,
'आज़ाद' के भावुक हृदय में, प्रेम का दीप जला तो दिया ॥  

विरह में ...

मेरे सपनों का जहाँ, अजीब हो गया ।
इस प्यार में यारों, मैं फ़कीर हो गया ॥
पता नहीं; अश्क आँखों में रुके या होठों तक आये ?
रातों की नींद, दिन के ख्याल, बस खो गया ॥
दर्द हुआ या नहीं, आभास ना होता है।
क्योंकि मेरी जान के बिना, मेरा शरीर हो गया ॥
उनकी हंसी के लिए, भुलाया था ज़माने को ।
'आज़ाद' आज वो ही हमसे, अजनबी सा हो गया ॥