Showing posts with label Article. Show all posts
Showing posts with label Article. Show all posts

Thursday, April 23, 2020

आधुनिकीकरण

आज हम ऐसे जमाने में रहते है जहाँ हकीकत अलग होती है और कार्यान्वरण अलग होता है | कभी कभी लगता है बड़े लोगों के बीच आ गए है जो इतना लम्बा लम्बा फेंकते है कि समेटने में ही जिंदगी निकल जाये | हमारे आसपास एक आवरण बना हुआ है ऐसे ही व्यर्थ के लोगों का | हम इसको दिखावा बोल सकते है | दिखावा भी एक परिधि में होना चाहिए अन्यथा वो खतरनाक साबित हो जाता है |
विज्ञान ने जिंदगी को बहुत आसान कर दिया है | घर बैठे बैठे ही पूरी दुनिया की सैर हो जाती है | अब लगता ही नहीं कि अपनों से दूर है | समाजसेवी चिल्ला रहे है कि पृथ्वी का तापमान बढ़ता जा रहा है, पेड़ मत काटिये, पीने वाला पानी ख़त्म होता जा रहा है, फिजूलखर्ची मत कीजिये, नई नई बीमारियां बढ़ती जा रही है, गंदगी मत कीजिये | लेकिन बंद घरों तक वो आवाज नहीं पहुंच पा रही है | तापमान को अपने हिसाब से नियंत्रण कर सकते है | पानी को पीने योग्य बनाना लगता है चुटकी का काम हो गया है | बीमारियों से लड़ने के लिए हमारे पास पैसा है | आज भी बगल से, अँधेरे में, कूड़े फेंकने की आवाज आती है | परन्तु ये सब धारणायें ही है हम प्रकृति को बाध्य नहीं कर सकते | सब जानते है प्रकृति अपना हिसाब करना जानती है |
आज थोड़ी धूप के लिए छाता चाहिए होता है | थोड़ी दूरी के लिए गाड़ी चाहिए होती है | थोड़ी बीमारी के लिए चिकित्सक चाहिए | इसी तरह का आधुनिकीकरण बहुत तेजी के साथ हो चुका है | एक होड़ सी मची है बड़े बड़े महल बनाने की | वातानुकूलित में रहने की | शहर के करीब रहने की | और ताजुब्ब होता है जब हम उम्मीद करते है अच्छी हवा की, अच्छे पानी की | शहर के हर घर, गली का पक्का हो जाना, शहरों का बड़ा हो जाना, तरस जाते है चुटकी मिट्टी के लिए, पँछियों की चहचाहट के लिए, ऊब जाते है धूल खाती जिंदगी से |
हम अपनी सहूलियत के लिए क्या क्या नहीं कर रहे परन्तु पर्यांवरण पर हम सिर्फ ज्ञान बाँट सकते है | पेड़ों  को काट काट कर महल बना सकते है | नदी, नालों में दूषित पानी को जाने से नहीं रोक सकते, जंगलों में आग लगाना या लगना, एक परंपरा हो गई है |  ऐसे ऐसे परीक्षण करेंगे कि मानवता ही खतरे में आ जाये | आखिर मानवता पर तो ज्ञान लेना या देना ही अच्छा है |  मैं की भावना घर कर गई है तभी तो प्रकृति के साथ खिलवाड़ किया जा रहा है |  दस्तावेजों में ही चीजों को अच्छा दिखाया जाता है परन्तु हकीकत में, हालात अच्छे नहीं है |  पर्यावरण के लिए पैसा पानी की तरह बहाया जाता है या शहरों के चौराहों पर बड़े बड़े विज्ञापनों पर दिखाया जाता है पर हम, हमारा समाज, हमारा तंत्र कोई वास्तविकता में कुछ नहीं कर रहा | 
विज्ञान में हम बहुत आगे बढ़ चुके है यहाँ तक की पृथ्वी के बाहर भी जा चुके है परन्तु हम उस विज्ञान को पर्यावरण मैत्री  क्यों नहीं बना रहे या फिर बनाना ही नहीं चाहते ? विज्ञान प्रदूषण रहित गाड़ियाँ  क्यों नहीं बना पा रहा ? पृथ्वी का बड़ा भूभाग समुद्र से घिरा है उसके पानी को पीने योग्य क्यों नहीं बनाया जा रहा ? लोगों के दिमाग में ये क्यों आ गया है कि शहर की जिंदगी ज्यादा सुरक्षित, संसाधनों से युक्त है ? जो चीजें प्रकृति या इंसानों के लिए अच्छी नहीं है उनका प्रतिस्थापन क्या है या क्यों नहीं बन पा रहा है ? हम इस धरा को खुद ख़त्म करना चाहते है ?       

Sunday, April 5, 2020

सरकारी तंत्र

जब भी सरकारी तंत्र का नाम जुबान पर आता है तो ये धारणा पहले ही मस्तिष्क में आ जाती है की सरकारी तंत्र मतलब निकम्मा, आलसी, बद्तमीज और काम ना करने वाला तंत्र | जोकि जनता के पैसों से ऐश करता है और जनता का ही काम नहीं करता |  बाबू गिरी वाला तंत्र | अपने मन के मालिक ही सरकारी तंत्र के नौकर होते है |
बहुत घृणा भरी है जनता के मन में इस तंत्र को लेके, और क्यों हो भी न, क्यूंकि उनको इस तंत्र से परेशानी होती है |  काम भी इसी तंत्र से पड़ता है और बार बार पड़ता है | बार बार बाबूजी बोलना पड़ता है | घंटों बाबूजी को बर्दास्त करना पड़ता है |
लोग गुस्से में बोलते है की प्राइवेट तंत्र ज्यादा अच्छा होता है क्यूंकि वो इज्जत के साथ पेश आते है और सर सर भी बोलते है बार बार | ये आपके बुलाने पर आपके घर तक भी आ सकते है |
परन्तु, जनता हमेशा प्रयास करती है सरकारी तंत्र का हिस्सा बनने के लिए, ये एक गौर करने वाली बात है | इसका मतलब क्या है ? जब हमको पता है कि सरकारी तंत्र अच्छा नहीं है फिर भी उसी तंत्र में आने के लिए मेहनत की जाती है |
भारत जैसे देश में ज्यादातर प्राइवेट तंत्र का मतलब होता है शोषण | और वहां काम करने वाले, कम्पनी के मालिक के नौकर होते है | जो अपना रोजगार बचाने के लिए उन्ही के आगे पीछे घूमते रहते है | इसका एक कारण ये भी हो सकता है है कि भारत जैसे देश में जनसंख्या ज्यादा होने के साथ साथ रोजगार के काफी कम श्रोत है | गरीबी भी इसका एक कारण हो सकती है | मानवता नाम की चीज बहुत कम बची हुई है और कर्मचारी के लिए कोई अधिकार नहीं होते, उनको जब चाहे कंपनी से निकाल सकते है | उनको जितना चाहे वेतन दे सकते है परन्तु उन्हें इसके खिलाफ बोलने का अधिकार भी नहीं है | अगर वो इतना दुस्साहस करते है तो उन्हें प्रताड़ित किया जाता है | नौकर को ज्यादा घंटे काम करने के लिए मजबूर कर सकते है | इसके अलावा छुटियाँ भी अपने हिसाब से तय कर सकते है | कर्मचारी पूरी तरह से बेबस होता है काम करने के लिए |
सरकारी तंत्र में ये सब नहीं होता है | वहां आप अपने से ऊपर वाले अधिकारी की बात में भी तर्क वितर्क कर सकते है | आपके वेतन में कोई सौदेबाजी नहीं होगी | आपके लिए छुटियाँ निर्धारित है | आपके काम करने के घंटे भी निर्धारित है | आप अपनी जिंदगी ज्यादा अच्छे से जी सकते है | आपको किसी की भी जी हजूरी करने की जरुरत नहीं है | आपको रोजगार से निकालना तो बहुत ही कम मामलों में होता है | वो भी तब जब मामला बहुत गंभीर हो | आप दिमागी तरीके से आजाद रहते हो |
अब सवाल यह है कि इतना अच्छा सुविधा देने वाला तंत्र बदनाम क्यों है ? इसके पीछे कहीं सरकार ही तो नहीं है | सरकारी तंत्र पर इतना भार होता है कम से कम संसाधनों से  तंत्र को चलाना होता है | जितना पैसा तंत्र पर खर्च किया जाना चाहिए उतना नहीं हो पाता है | रिक्तियों को सरकार भरना नहीं चाहती है | सरकारी तंत्र में भी चापलूसी वाला माहौल प्रारम्भ हो चुका है | अगर आप अपने से ऊँचे पद पर बैठे कर्मचारी की चापलूसी करोगे तो आपकी पदोन्नति जल्दी से जल्दी हो जाएगी |  इससे इस तंत्र के कर्मचारियों में विरोधाभाव पनप जाता है और वो एक दूसरे के खिलाफ ही लड़ने लगते है |  वो हमेशा चालबाजियों को सीखने में लग जाते है |  वो एक दूसरे से बात करना तो दूर एक दूसरे को देखना भी नहीं चाहते, जबकि वो एक ही तंत्र का हिस्सा होते है | ये सरकारी तंत्र को ख़त्म करने का सबसे अच्छा तरीका है | ऊपर बैठे लोग सरकार के इशारों से काम करते है | फिर किसको परवाह जनता की क्यूंकि उनके ऊपर तो चापलूसी वाला हाथ होता है | ये विडंबना ही है जो सरकार जनता के लिए होती है है वो ही जनता के इस तंत्र को उन्ही के सामने इस्तेमाल करती है, उसको नष्ट कर देना चाहती है | मतलब सरकारे जनता का भला नहीं चाहती |          

Wednesday, October 28, 2015

वक्त


कभी कभी वक्त हमें कमजोर करता चला जाता है । हम वक्त की आँधी में रेत की तरह उड़ते रहते है । हमारे सपने जो हमारे दिलों-जहाँ में बसे थे, वक्त की रफ़्तार में फीके पड़ते जाते है । ऐसा लगता है हमारा अपने ऊपर कोई संतुलन नहीं है । हम कुछ नहीं कर सकते । हम अपनी जिंदगी खो चुके है । हमारी मन:स्थिति निष्किय अवस्था में जा चुकी है । हम दुःख की अंतिम सतह में पहुंच जाते है । जहाँ पहुंचकर हम मौत का इन्तजार करते है । हम थक चुके होते है रोज रोज की कलह से ।
ये दुनिया एक मोहमाया है जिसमे हम सब उलझे हुए है । क्षणिक सुख को हम उत्सव की तरह मनाते है परन्तु क्षणिक दुःख हमसे असहजनीय हो जाता है । हमारे अंदर इतना भी सामर्थ्य नहीं होता की हम उस पल को बुरे स्वप्न की तरह जाने दे । हम सम और विषम परिस्थितियों में एक जैसे तो नहीं रह सकते क्योंकि हम इंसानों की दुनिया में बसते है । क्या हम उन परिस्थितियों में ऐसा कुछ नहीं कर सकते जिससे दुनिया ये ना जान पाये की हम उन हालात से गुजर रहे है ? हम अपनी भड़ास किसी निर्दोष व्यक्ति पर कैसे निकाल सकते है ? क्या हम इंसानियत की हदों को पार करके कुछ पा सकते है ?
दुनिया बहुत बड़ी है और हम अक्सर सोचते है की हमारे पास इतना वक्त नहीं की हम किसी को  व्यक्तिगत तौर पर परखे । क्या ये सही है की किसी तीसरे व्यक्ति के कहने से हम किसी का कुछ अहित करें ? क्या तीसरा व्यक्ति हमेशा सही बोलता है ? क्या तीसरे व्यक्ति का उस अहित में अपना हित नहीं छुपा है ? हममे से ज्यादातर लोग ईश्वर को मानते है, उसके आगे सिर झुकाते है परन्तु हम इंसानों की दुनिया में उन लोगों का अहित सोचते है जो कभी किसी का अहित नहीं सोचते । हम अक्सर उन बातों को ताजा करते रहते है जिन्होंने हमें कभी बहुत दुःख दिए थे । हम जिंदगी को इसी उलझन में निकाल देते है की कब किसने क्या बोला था ? बिन मतलब छोटी छोटी बातों को बड़ा बना देते है । क्या जिंदगी जीने का यहीं एकमात्र तरीका है ?
किसी से बदला लेने से अच्छा उसे बदलना होता है । किसी ने हमारे साथ बुरा किया है तो क्या हम दूसरों के साथ भी वहीँ बर्ताव करें ? वक्त हमेशा चलायमान रहता है और ये भी संभव है की जिसने हमारे साथ बुरा किया वो आने वाले दौर में हमारा परम हितेषी बन जाये । वक्त हर प्राणी की मनोदशा को बदलता रहता है । वक्त किसी का ग़ुलाम नहीं सिवाय कर्मयोगी के । कर्मयोगी वक्त की हर चाल को समझता है और वो सबको अपना ग़ुलाम बना सकता है पर वो  ऐसा नहीं करता । कर्मयोगी संसार की मोहमाया, आशा, तृष्णा, दुःख, सुख, जीवन, मरण, यश, अपयश इत्यादि से अलग हो चुका होता है । क्या ऐसे इन्सान भी धरा पर है ?
जिंदगी जीने का सबका अपना तरीका होता है । परिस्थिति जिंदगी जीने के ढंग को बदल देती है । कुछ जिंदगी को जीते है तो कुछ को जिंदगी जी लेती है । हम सब लघु समय के लिए धरा पर जन्म लेते है पर इस लघु समय में हम दोस्त कम और दुश्मन ज्यादा बनाते है, सिर्फ अपने लघु विचारों से, लघु आकर्षण के लिए, लघु शान शौकत अय्यासी के लिए ।  हमारी विचार धारा इतनी संकुर क्यों होती जा रही है ?

Thursday, May 7, 2015

जीवन का सत्य


हम इंसानों की दुनिया बड़ी विचित्र है । हम ईश्वर की खोज में पता नहीं कहाँ कहाँ तक पहुंच जाते है, पर उस इंसान की कभी पूजा नहीं की जो खुद ईश्वर है । उसने कभी बोला नहीं की वो ईश्वर है । पर उसने कभी किसी का बुरा नहीं किया, शायद सोचा ही नहीं था । हम उस पर विश्वास नहीं करते जो हमारे पास है, हम भागते रहना चाहते है ताउम्र । यहीं तो दुःख की चाल है ।

किसी के मन में क्या चल रहा है जानना मुश्किल होता है । परन्तु हमारे मन में क्या है उस पर हमें गौर करना चाहिए । क्या सही है क्या गलत, हम सबको भलीभांति पता रहता है । कभी भी हमें खुद को ऊँचा साबित नहीं करना चाहिए । क्योंकि ईश्वर की सत्ता को हम कभी नहीं जान सकते । हमें ईश्वर को धन्यवाद देना चाहिए, उसने हम सबको मौत जैसे सुन्दर पल दिए । मौत की यादें हमारी बुराइयों को कम कर सकती है ।

हम जिंदगी की दौड़ में हिस्सा लेते है । कभी कभी वो दौड़ हमारी मौत को बदनाम कर देती है । हमने गलत किया, ऐसा नहीं करना चाहिए था, सोच इंसान को बलबती बनाती है । हर पल हमें ऐसे उसूलों पर काबिज रहना चाहिए । अपने आंतर से मानी हुई गलती क्षमा योग्य होती है ।

किसी पर अटूट विश्वास करना, किसी के खातिर जीना, इंसान की अपनी सोच है । अगर वो सोच नीयत के विरुद्ध नहीं है तो वो महानता है । जो परमत्व से जोड़ सकती है । कुछ क्षण आंतर की बुराई से उपजे पाप, हमारे मन को दूषित कर सकते है । परन्तु हमारे जीवन की लम्बी साधना, उस बुराई को तन तथा मन से दूर करने में सक्षम होती है । हमें किसी की भावनाओं को आहात किये वगैर सत्य के रास्ते पर चलने का हमेशा प्रयत्न करना चाहिए ।

Saturday, November 23, 2013

भारत के विकास में बाधक: अमीरी या गरीबी ?

हम भारतवासी एक विशाल भूखंड पर निवास करते हैं । भारत में उपलब्ध विभिन्न प्रकार के प्राकृतिक स्रोत हमें अपने आप पर ही निर्भर बना सकते है । बहुत सारी नदियों का जल हमें विश्व में कृषि के क्षेत्र में अग्रसर बनाये हुए है । तरह-तरह की वेशभूषा, रहन-सहन, भाषा, जलवायु इस देश के महत्त्व को और भी बढ़ा देती है । इन सबसे ऊपर हमारा लोकतान्त्रिक संविधान विश्व में अलग पहचान बनाये हुए है । परन्तु आज़ादी के इतने सालों  बाद भी हम दूसरे विकसित देशों की तरह विश्व में अपनी अलग धाक नहीं जमा पाये है । आज भी हम विश्व के नामी-गिरामी देशों के आगे अपने को बेबस और मजबूर देखते है । आखिर इसके पीछे कौन जिम्मेदार है ?  
भारत एक लोकतान्त्रिक देश तो है परन्तु सही मायनों में यहाँ लोकतंत्र का उपयोग नहीं हो पा रहा है । शासित लोग ही इस देश को विश्व का आदर्श शक्तिशाली देश बना सकते है ।भारत में जगह-जगह नक्सलवाद, माओवाद, जातिवाद, और धर्म के नाम पर होने वाली लड़ाईयां ये प्रदर्शित करती है कि देश का भविष्य गर्त कि तरफ जा रहा है और सरकारों की मानसिकता इसे आसान करती जा रही है । सही कानूनों का सख्ती के साथ पालन नहीं हो रहा है । सरकारों की राजनीति, लोगों को एक-दूसरे से नफ़रत की तरफ ठकेल रही है और उनमें "पहले भारतीय" का अहसास कम होता जा रहा है । इसी के परिणामस्वरूप लोग अब सिर्फ अपने और अपनों के फायदों के बारे में ही सोचते है ।
भारत में आर्थिक स्थिति के हिसाब से दो वर्गों का उत्थान हो चुका है, अमीरी तथा गरीबी ।  जहां भारतीय विश्व में अमीरी में अच्छे स्थान पर आते है वहीं गरीबी भी एक चिंताजनक स्थान पर है । इन दोनों के बींच का लम्बा फासला सरकार की कमजोरी को उजागर करता है । अवैध तरीकों से दूसरे देशों में छिपाया गया धन लोगों के मन से भारतीयता को हटा देता है । अगर उन अमीर लोगों की मानसिकता को बदला जा सके तो वो धन देश को काफी आगे ले जा सकता है । गरीबी में लोगों का दो वक्त के खाने का संघर्ष, देश के लिए कुछ ना कर पाने की मजबूरी है । आखिर उन्हें जिंदगी को आगे तो बढ़ाना है । हिंदी में एक कहावत प्रसिद्द है कि "भूखे पेट भजन होये ना गोपाला" । इसका शाब्दिक मतलब है कि जब तक इन्सान की प्रमुख जरूरतें पूरी नहीं हो जाती तब तक उसकी प्राथमिकता देश विकास नहीं अपनी जरुरत ही होगी ।
एक लोकतांत्रिक क्षेत्र-विशेष या देश के निर्माण का उद्देश्य भी यहीं होता है कि देश की परिधि में रहने वाले सभी लोगों के हितों की रक्षा की जाये । अन्यथा राजा-महाराजाओं वाले शासन से हम कैसे अलग है ?  इसके लिए संविधान ने न्यायलयों कि स्थापना की। पर लगता है वो पुराना राजाओं वाला शासन आज भी है बस उसे अलग तरह से परिभाषित कर दिया गया है । जैसे राजा लोगों को उपहार देकर खुश कर देते थे वैसे ही आज अमीर वर्ग धन से नियमों के साथ खिलबाड़ कर रहे है । अदालतों में सजा अपराधियों की असल मृत्यु के बाद तक सुनाई जाती है । निर्दोष लोगों को जबर्दस्ती फंसा कर मानवता का उपहास किया जा रहा है ।
अमीरों का उद्देश्य "मैं ही, बस मैं ही रहूँ" रहता है । अमीर नहीं चाहते कि आज का कोई गरीब कल को  उनके साथ बराबर में खड़ा हो । अतः वो हर कुटिल चाल से गरीबों को आगे बढ़ने से रोकता है । सरकार में भी इसी तरह के लोगों का बोलवाला होता है और वो सिर्फ अपनी मनमर्जी करते है । इसीलिए भारत के शिक्षित युवा विदेशों में चले जाते है क्योंकि उनको यहाँ उनके अनुरूप नौकरी नहीं मिल पाती ।  और उनका भारत भविष्य में योगदान नगण्य हो जाता है । ये सब अपनी लोकतान्त्रिक सरकार का भ्रष्टाचार के आगे नतमस्तक हो जाना दिखाता है ।
  

Thursday, December 15, 2011

सबको समझो

 मैंने ऐसा नहीं सोचा था. मेरे कहने का वो मतलब नहीं था. मैं तो कुछ और सोच के बोला था. पर उसने वो नहीं सुना जो मैं कहना चाह रहा था. उसने उसे गलत समझा. मैंने हर तरह से उसे समझाने की कोशिश की, पर वो तो बड़ी के ऐंठ में था. लोग हर बार वोही बोलते थे कि थोड़ा और अनुभव लो जबकि हकीकत तो उन्हें भी पता होती थी. वो हमेशा कहते थे कि तुम कुछ भी नहीं जानते हो, शायद वो कुछ और ही कहना चाह रहे थे. पर मैं तो नादान
नहीं था. सबकुछ समझ सकता था, उनको वो सब साफ़ साफ़ कहना चाहिए था. पद के नशे में अँधा हुआ हमेशा अँधा ही रहता है क्योंकि शबाब उसे सोचने नहीं देता. उसने मुझे ऐसा बोला मुझे दुःख हुआ, क्योंकि उसने उसे परिहास का विषय बना दिया. उसके द्वारा बोला गया एक एक शब्द मेरे को संताप दे रहा था. पर मैं खामोश ही रहा पता जो था, बात बढने पर सिर कुटते है.------------------------------------------------------------------

शायद मैंने भी कभी किसी को ऐसे ही बोला होगा, मजे लेने के लिए. इन्सान कि प्रव्रत्ति मजे लेने के लिए लालायित जो रहती है. पर सबके मजे लेने के ढंग अलग अलग होते है. कोई इस तरह से लेता है कि किसी को पता भी चलता. कुछ इस तरह से कि जमाना जान जाता है. शायद मैंने भी ये नहीं सोचा होगा कि मेरे मजे लेने से दूसरा क्या क्या कर सकता है? क्योंकि अगर मैं ऐसा सोचता तो मैं जिन्दगी को आदर्श जिन्दगी बना सकता था. इस बात ने मुझे लोगो से बात करना छुड़वा दिया. केवल कैसे हो? क्या चल रहा है? से तंग जो था. लोगो को उबाऊ लोग पसंद नहीं. जबकि सब उनका उदाहरण देते है.-------------------------------------------------------------
एक मानव होने के नाते उससे ये ही तो पूझा था कि मैंने गलती क्या कि है? अगर हम सभ्य समाज के सपने देखते है तो उनके लिए उन पदचिन्हों पर चलना भी पड़ेगा, जिनके बिना सभ्य समाज कि नींव नहीं डाल सकते. अगर मैंने गलती कि थी तो उसे बताना चाहिए था ताकि मैं उससे सबक ले सकू. डांट फटकार कर चले जाने को कह देना, उसके लिए आसान था, शायद और लोगो के लिए भी आसान होता, शायद किसी घड़ी में मेरे लिए भी. पर उस समय मुझे वो सब खल गया. ये तो जिसका प्रतिविम्व था खुद विचलित था. अगर मैं ये किसी और बरिष्ठ को बोला तो वो बोला इसमे बुरा क्या लग गया? परन्तु उस समय जो आवाज, चेहरे कि भाव भंगनाएं बदलते हुए जिस तरके से निकली थी उसको मैं कैसे समझाता. --------------------------------------
मैं धन्यवाद देता हूँ उस ईश्वर का जिसने मौत बनायीं और हम लोगो ने संसार को नश्वरवाद नाम दे दिया. मौत हमारे प्रदर्शन का अंतिम दर्शन है. मौत को भूल जाने वाला ही दुखी और लोलुप बन जाता है. हम सब दुखी और लोलुप बनते जा रहे है. प्रकृति ने धरा को सबकुछ दे रखा है. लेकिन जब धरावासी प्रकृति के नियम तोड़ते है तो उसका कोप जाग जाता है. कोप का भाजन श्रद्धा के तांते से जो होता है. प्रकृति के नियम को समझना और उसे अमल करना थोड़ा कठिन है तभी तो बहुत कम लोग उसके रहस्यों को जानने कि चेष्ठा करते है. ----------------------------------------------------------------
घरो को पत्थरो और दीवारों को तस्वीरों से भर देने से कुछ नहीं होता उससे डरना भी चाहिए. पहले होता आया है इसलिए मैं कर रहा हूँ, ये सही और सटीक जबाब नहीं है. आप मानव हो, मानवता ही आपके रग रग में होनी चाहिए. वो तो कभी न रोया जिसको रोना चाहिए था. परन्तु ये आंसू उनकी ही आँखों में क्यों आते है, जो रोने के लिए बाध्य है. वो कर सकते है सबकुछ पर उनके पत्थर दिल पे सांप जो लेता है. तथा जो कर के दिखाते है उनको पहचानने कि फिदरत हममे है ही नहीं.----------------------------------------------------------------------------
इसने बोला ये करो, उसने बोला वो कर, तुम कर सकते हो कम से कम प्रयास तो करो. हर कोई मेरे से उम्मीद कर रहा है. सभी ने मेरे से कुछ करने के लिए बोला पर किसी ने वो नहीं कहा जो मुझे करना चाहिए था. जो मेरे लिए और आदर्श समाज के लिए जरुरी है. कैसी विडम्बना है लोगो कि वो उढे तो सभी ने उन्हें अपना आदर्श बना लिया, पर जिस समय वो जाग रहे थे तो उन सभी ने उन्हें अपमानित किया था. यह जरुरी नहीं कि अच्छा शरीर, अछ्छा धन और समाज में अछ्छी पहचान, कुछ को हमेशा खुश रख सकती है. वो तो अपने को दुर्बल, असहाय भी मान सकते है. ख़ुशी और दुःख तो ये दर्शाता है कि हमारी सोच - विचारो कि जड़े कितनी पैन्ठी है. ---------------------------------------------------------------------------------------
अब क्या हुआ? मैंने सब कुछ तो कर लिया, जो आपने कहा था. अब आप को गुस्सा क्यों आया? इतने पर वो बोखला कर बोला क्या तुम मेरे गुस्से को कम करोगे? अभी ये काम करना है अभी वो काम करना है. कोई भी अछ्छी तरह से काम नहीं करना चाहता. मुझे बहुत आश्चर्य हुआ. उनके कहे हुए काम को कोई न करे ये तो नामुमकिन था. फिर वो आखिर जाताना क्या चाह रहा था? जबकि उसको मैंने कभी काम करते देखा ही नहीं बस बोलते ही देखा था. शायद वो ये बताना चाह रहा था कि वो बस बोलेगे और उसके खिलाफ कोई नहीं बोलेगा. -----------------------------------------------------------------------------------------------   




 








     

Saturday, July 16, 2011

अंतिम ख़त

उस रात मैं अच्छी तरह से सो नहीं पाया था| कारण? मैं दुनिया के रीती रिवाजो और उनके कानूनों को करीब से झाँखने की कोशिश कर रहा था| सोच रहा था कि  हर आदमी इतना तो स्वत्रंत होना चाहिए कि उसको अपनी जान गंवानी कि नौबत ना आये| मैं दिमाग की अंतिम सतह पर था, क्योंकि मैंने कभी सोचा भी ना था कि लोग हालात में क्या क्या कर सकते है? उसके बाद मैंने जिन्दगी को अलग नजरिये से देखना आरम्भ किया क्योंकि उस घटना ने मुझे सोचने पर मजबूर जो किया था|   
दरवाजे पर आहात हुई थी बाहर कोई बुला रहा था आकाश दोड़ता हुआ गया| वो मेरे रूम में ही रहता था| मैं दुपहर की नींद का लुफ्त उठा रहा था| वो अपनी दिनचर्या को सख्ती से निभाता था| सुबह से लेकर शाम तक मुझे समय की कीमत ही बताता था| हम दोनों का इंजीनियरिंग में प्रथम साल चल रहा था| परीक्षाएं पास थी|
दरवाजे पर पोस्टमेन था| मैंने उसे उछलते  हुए देखा| वो ख़ुशी से चिल्ला रहा था मेरा ख़त आया है, मुझे उसने फिर याद किया है, वो मुझे भूले नहीं है, वो मेरे अपने है, वो मेरा सब कुछ है, इस महीने में तीसरा ख़त आया है, पर अफ़सोस मैं एक भी ख़त नहीं डाल सकता, ये क्या जिन्दगी है मेरी? दुनिया की बंदिशों ने मुझे बांध के रखा है| लेकिन जल्दी... जल्दी मैं उन्हें मिलने जाऊंगा|
वो जल्दी जल्दी में जाने क्या क्या बोलता जा रहा था| वो बहुत खुश नजर रहा था| मैंने पूछा क्या हुआ भाई किसका ख़त है? वो बोला मेरे महबूब का|  
उसने जल्दी से लिफाफा फाड़ा और ख़त पढ़ना आरम्भ किया| मैंने मजाक के लहजे से बोला, भाई अपने महबूब की कुछ खुशखबरी मुझे भी सुना दो| वो ख़ुशी में बोला ठीक है मैं जोर जोर से पढ़ता हूँ| और वो जोर जोर से पढ़ने लगा| उसने पढ़ा "मेरे प्राणप्रिये दोस्त, अभी तक तो तुम मेरे सिर्फ अच्छे दोस्त थे लेकिन आज मैं तुम्हे अपना......... " इसके बाद वो धीरे धीरे पढ़ने लगा और धीरे धीरे उसके गाल अंशुओं से भीगने लगे| मैंने पूछा क्या हुआ? वो कुछ नहीं बोला| वो पढ़ रहा था और रो  रहा था| मैं भी परेशान हो गया शायद कुछ बुरी खबर है| मैंने फिर पूछा सब ठीक तो है? वो फूट फूट कर रोने लगा और अपना सिर पकड़कर नीचे बैढ़ गया| मैंने अपना बिस्तर छोड़ा और उसके पास गया| उसके कंधे पर हाथ रख कर पूछा क्या हुआ? उसने कुछ कहा नहीं| वो ख़त मुझे पकड़ा दिया| इससे पहले वो अपना ख़त मुझे कभी नहीं पढने देता था| मैंने उससे कहा क्या मैं इसे पढ़ सकता हूँ? उसने सम्मति मैं अपना सिर  हिला दिया| उसके बाद मैंने ख़त पढना आरम्भ किया| मैं जैसे जैसे ख़त पढ़ रहा था मेरे दिमाग के भाव बदल रहे थे| जब सारा ख़त पढ़ लिया तो मैं भी खामोश हो चला था और ना चाहते हुए भी आंसुओं को रोक नहीं पा रहा था| मेरी समझ में नहीं  रहा था की दोस्त को कैसे सांत्वना  दू क्योंकि मैं खुद कमजोर हो गया था| उस ख़त ने मेरी जुबान  रोक दी थी| ख़त का एक एक शब्द मेरे दिमाग में कोंध रहा था| क्योंकि वो उसका अंतिम ख़त था| ख़त में लिखा था 
"मेरे प्राणप्रिये दोस्त, अभी तक तो तुम मेरे अच्छे दोस्त थे लेकिन आज में तुम्हे अपना परमेश्वर मानती हूँ| तुम मेरे पास रहते थे तो मुझे बहुत अछ्छा लगता था| लगता था जैसे संसार की हर ख़ुशी मुझे मिली है| मैं ये ख़ुशी हमेशा के लिए ताउम्र पाना चाहती थी| पर वो साथ आजीवन नहीं हो पाया| आज मैं तुम्हे अपने दिल की बात बता रही हूँ तुम्हारे बिना रहते हुए मुझे पता चला की मैं तुम्हारे बिना नहीं रह सकती| जब तुम एक भी दिन नहीं मिलते थे तो मैं बहुत रोती थी और खाना भी नहीं खाती थी, उस दिन अपने जीवन का बड़ा दुखमय दिन मानती थी| मुझे नहीं पता प्यार क्या होता है? लेकिन ये तन्हाई मुझे अकेला अकेला सा महसूस होने पर मजबूर कर रही है| ऐसा लगता है जैसे मेरी दुनिया उजड़ गयी है, तुम्हारे बिना किसी भी चीज की इच्छा ही नहीं होती| रात को तुम्हारे स्वप्न और दिन में तुम्हारी कल्पना मुझे न सोने देती है न कुछ खाने देती है| मुझे तुम्हारे विरह ने बहुत कमजोर बना दिया है| मेरी हर स्वास में तुम्हारा भोलापन, तुम्हारे संग की बातें, तुम्हारा वो मुझे पढाना, तुम्हारी आँखों में मेरे लिए वो अंशु, मुझे परेशान करते हुए आते है| क्या तुम भी कभी पुरानी यादों को याद करते हो? क्या तुम भी मुझे चाहते हो? क्या तुम भी मेरे लिए इतना ही परेशान हो? शायद इनका जबाब मैं नहीं सुन सकती| मेरे घर वाले मुझे कही जाने नहीं देते उन्होंने यहाँ मेरी जेल बना  दी है| मैंने पढने को बोला तो कहते  है की लड़की जितना कम पढ़े उतना ही अछ्छा है| मेरे ज्यादा कहने पर उन्होंने मुझे बी का फॉर्म प्राइवेट भरवा दिया है| मेरे घर वाले मेरी शादी करना चाहते है उन्होंने लड़का भी खोज लिया है जबकि मैं तुमसे शादी करना चाहती हूँ| पर मैं अपने घरवालो को भी नहीं बता सकती क्योंकि तुम तो जानते हो की मेरे घर वाले कितने बुरे इंसान है| अगर मैंने तुम्हारे बारे में  बताया तो वो तुम को मार डालेंगे इसी वजह से मैंने नहीं बताया| तुम पढने मे काफी  अच्छे हो तुम अच्छा पढ़ लिखो| अगर हम भाग कर भी गए तो घर के रास्ते बंद हो जायेंगे और अभी हम अपने पैरो पर भी खड़े नहीं हुए है| इससे तुम्हारा भविष्य ख़राब हो जायेगा| मैं तुम्हारे भविष्य को ख़राब नहीं कर सकती| मुझे ख़ुशी होगी की तुम खूब मन लगा के पढो| मेरी परवाह ना करना| क्योंकि हम लडकियों का इस संसार में कोई औचित्य नहीं है| उन्हें तो घर की चारदीवारी में  बांध के रखा जाता है| हम लड़किया तो गुलामो की जिन्दगी जीते है| हमारा घूमना तो दूर, किसी से बात भी नहीं कर सकते| क्या जीवन है हमारा| मैं किसी दूसरे  से शादी नहीं करूंगी क्योंकि मैं तुम्हारी ही रहूंगी हर पल हर जगह हर माहोल  में| मैं तुमसे प्यार करती हूँ इसलिए मैंने मरने का फैंसला लिया है मैं अपनी जान दे रही हूँ| तुम खुश रहना और अछ्छी तरह पढना| तुम्हारी  अपनी "आदी"
इस ख़त ने मुझे बैचेन कर दिया था| पर मैंने अपने अन्दर भाव को छिपाकर उसे बोला कि उसने मजाक किया है क्योंकि वो तुमसे प्यार करती है और उसका मन तुमसे मिलने को होगा इसलिए इस तरह का ख़त लिखा है| इसमे परेशान होने कि कोई जरुरत नहीं है| तुम जाओ और उससे मिल आओ| मैंने उसे बोला कृपया  तू जल्दी से जा  और उसे यकीन दे देना की तू भी उसी का है| मैं उसे बहुत तरह से समझा रहा था पर शायद वो जानता था कि आदी इस तरह का मजाक कभी नहीं करेगी| 
मैं सोच रहा था की लोग  ऐसा क्यों करते है की जिसकी वजह से किसी को अपनी जान गवानी पड़ती है|  क्या लोग अपने रीती रिवाजो को बदल नहीं सकते| आज तीन साल के बाद वो धीरे धीरे हंसने की कोशिश करता है पर हंस नहीं पाता  वो आज भी ख़ामोशी में है और दुनिया से अलग अपने ही विचारो में जी रहा है|