Thursday, April 23, 2020

आधुनिकीकरण

आज हम ऐसे जमाने में रहते है जहाँ हकीकत अलग होती है और कार्यान्वरण अलग होता है | कभी कभी लगता है बड़े लोगों के बीच आ गए है जो इतना लम्बा लम्बा फेंकते है कि समेटने में ही जिंदगी निकल जाये | हमारे आसपास एक आवरण बना हुआ है ऐसे ही व्यर्थ के लोगों का | हम इसको दिखावा बोल सकते है | दिखावा भी एक परिधि में होना चाहिए अन्यथा वो खतरनाक साबित हो जाता है |
विज्ञान ने जिंदगी को बहुत आसान कर दिया है | घर बैठे बैठे ही पूरी दुनिया की सैर हो जाती है | अब लगता ही नहीं कि अपनों से दूर है | समाजसेवी चिल्ला रहे है कि पृथ्वी का तापमान बढ़ता जा रहा है, पेड़ मत काटिये, पीने वाला पानी ख़त्म होता जा रहा है, फिजूलखर्ची मत कीजिये, नई नई बीमारियां बढ़ती जा रही है, गंदगी मत कीजिये | लेकिन बंद घरों तक वो आवाज नहीं पहुंच पा रही है | तापमान को अपने हिसाब से नियंत्रण कर सकते है | पानी को पीने योग्य बनाना लगता है चुटकी का काम हो गया है | बीमारियों से लड़ने के लिए हमारे पास पैसा है | आज भी बगल से, अँधेरे में, कूड़े फेंकने की आवाज आती है | परन्तु ये सब धारणायें ही है हम प्रकृति को बाध्य नहीं कर सकते | सब जानते है प्रकृति अपना हिसाब करना जानती है |
आज थोड़ी धूप के लिए छाता चाहिए होता है | थोड़ी दूरी के लिए गाड़ी चाहिए होती है | थोड़ी बीमारी के लिए चिकित्सक चाहिए | इसी तरह का आधुनिकीकरण बहुत तेजी के साथ हो चुका है | एक होड़ सी मची है बड़े बड़े महल बनाने की | वातानुकूलित में रहने की | शहर के करीब रहने की | और ताजुब्ब होता है जब हम उम्मीद करते है अच्छी हवा की, अच्छे पानी की | शहर के हर घर, गली का पक्का हो जाना, शहरों का बड़ा हो जाना, तरस जाते है चुटकी मिट्टी के लिए, पँछियों की चहचाहट के लिए, ऊब जाते है धूल खाती जिंदगी से |
हम अपनी सहूलियत के लिए क्या क्या नहीं कर रहे परन्तु पर्यांवरण पर हम सिर्फ ज्ञान बाँट सकते है | पेड़ों  को काट काट कर महल बना सकते है | नदी, नालों में दूषित पानी को जाने से नहीं रोक सकते, जंगलों में आग लगाना या लगना, एक परंपरा हो गई है |  ऐसे ऐसे परीक्षण करेंगे कि मानवता ही खतरे में आ जाये | आखिर मानवता पर तो ज्ञान लेना या देना ही अच्छा है |  मैं की भावना घर कर गई है तभी तो प्रकृति के साथ खिलवाड़ किया जा रहा है |  दस्तावेजों में ही चीजों को अच्छा दिखाया जाता है परन्तु हकीकत में, हालात अच्छे नहीं है |  पर्यावरण के लिए पैसा पानी की तरह बहाया जाता है या शहरों के चौराहों पर बड़े बड़े विज्ञापनों पर दिखाया जाता है पर हम, हमारा समाज, हमारा तंत्र कोई वास्तविकता में कुछ नहीं कर रहा | 
विज्ञान में हम बहुत आगे बढ़ चुके है यहाँ तक की पृथ्वी के बाहर भी जा चुके है परन्तु हम उस विज्ञान को पर्यावरण मैत्री  क्यों नहीं बना रहे या फिर बनाना ही नहीं चाहते ? विज्ञान प्रदूषण रहित गाड़ियाँ  क्यों नहीं बना पा रहा ? पृथ्वी का बड़ा भूभाग समुद्र से घिरा है उसके पानी को पीने योग्य क्यों नहीं बनाया जा रहा ? लोगों के दिमाग में ये क्यों आ गया है कि शहर की जिंदगी ज्यादा सुरक्षित, संसाधनों से युक्त है ? जो चीजें प्रकृति या इंसानों के लिए अच्छी नहीं है उनका प्रतिस्थापन क्या है या क्यों नहीं बन पा रहा है ? हम इस धरा को खुद ख़त्म करना चाहते है ?       

Friday, April 17, 2020

मतलब की दुनिया

ब्यार बही मन उड़ा, काफ़िर अब क्यूँ रोता है ?
निर्लज्ज, नालायक मन, क्यूँ उसमें खोता है ?

सारे रिश्ते उसने भुला दिये, पता नहीं क्यूँ ?
क्यूँ आँखों में भर नींद उनकी, स्वप्नों में सोता है ?

चाह क्या है मेरी, उनको इससे क्या लेना |
पलकों पे सजा चाह उनकी, बस वोही तो होता है ||

तेरे इरादे ना समझा, पर मेरे इरादे तू समझ गई |
मुकर गई हर बात से, क्या तू स्वार्थ का झरोटा है ?

दिल तोडा तूने, दर्द हुआ, उस ग़म को तू क्या जानेगी ?
'आज़ाद' प्यार ना दुनिया में, मतलब में सब होता है ||

Wednesday, April 15, 2020

तेरी ख़ामोशी

तेरी ख़ामोशी मुझे, बहुत परेशान करती है |
झूठ ही कह दे, कि तू मुझसे प्यार करती है ||

मुस्कराने का तमाशा, अब ना होगा मुझसे |
ये बिचारी दुनिया, जो मुझे बिंदास समझती है ||

ये तू ही है, जो मुझे बदल रही है |
वरना जिंदगी अपनी तो, सूनेपन में ही रहती है ||

तूने देखा ना कभी, तूने पहचाना ना कभी |
मेरी नज़रों में बस तू ही, तू ही तू दिखती है ||

फांसले बहुत है, कैसे कहूँ तुझे दिल की बात|
'आज़ाद' बस समझ ले तू, मेरी सांस तुझसे ही बहती है ||  

Monday, April 6, 2020

ये रात

चाँद भी निकला है, तारे भी हंस रहे है |
इस शांत रात में, हम क्यूँ तड़फ रहे है ?
हम थे ही अकेले, इससे दुःख क्यूँ हुआ ?
हर आहत अपनी है, अँगारे हृदय में जल रहे है ||

आज की ये रात, बढ़ती ही जा रही है | 
गैरों के लिए जिंदगी, ढ़लती ही जा रही है ||
छिपाते है ख्वाब तो, ये दिल जल  उढ़ता है |
बताने पर हर ख़ुशी, मरती ही जा रही है ||

विस्तृत चाँद के प्रकाश में, मधुर ब्यार बहती है |
जब छूकर निकलती है, हर दर्द बयाँ करती है ||
नहीं ये दर्द नहीं है, मेरे प्रियतम के हृदय का |
कह दो झूठ बोला, वो अब भी प्यार करती है ||

ये रात बड़ी शांत है, जरा खुद को समझ लू मैं |
कोई नहीं यहां मेरा, क्यूँ न अब समझ लू मैं ||
बिसरा दिया जगत ने, क्यूँ किसको याद रखूँ |
हकीकत से था दूर, सच्चाई को समझ लू मैं ||

ऐ रात! ढल ना अब, मैं विरह का सताया हूँ |
सुमधुर मिलन की आस, आतप को ही पाया हूँ ||
उम्मीद की थी उनसे, अनगिनित गम ही मिले |
'आज़ाद' न चाह सुबह की, जिंदगी से ही खफा हूँ || 

Sunday, April 5, 2020

सरकारी तंत्र

जब भी सरकारी तंत्र का नाम जुबान पर आता है तो ये धारणा पहले ही मस्तिष्क में आ जाती है की सरकारी तंत्र मतलब निकम्मा, आलसी, बद्तमीज और काम ना करने वाला तंत्र | जोकि जनता के पैसों से ऐश करता है और जनता का ही काम नहीं करता |  बाबू गिरी वाला तंत्र | अपने मन के मालिक ही सरकारी तंत्र के नौकर होते है |
बहुत घृणा भरी है जनता के मन में इस तंत्र को लेके, और क्यों हो भी न, क्यूंकि उनको इस तंत्र से परेशानी होती है |  काम भी इसी तंत्र से पड़ता है और बार बार पड़ता है | बार बार बाबूजी बोलना पड़ता है | घंटों बाबूजी को बर्दास्त करना पड़ता है |
लोग गुस्से में बोलते है की प्राइवेट तंत्र ज्यादा अच्छा होता है क्यूंकि वो इज्जत के साथ पेश आते है और सर सर भी बोलते है बार बार | ये आपके बुलाने पर आपके घर तक भी आ सकते है |
परन्तु, जनता हमेशा प्रयास करती है सरकारी तंत्र का हिस्सा बनने के लिए, ये एक गौर करने वाली बात है | इसका मतलब क्या है ? जब हमको पता है कि सरकारी तंत्र अच्छा नहीं है फिर भी उसी तंत्र में आने के लिए मेहनत की जाती है |
भारत जैसे देश में ज्यादातर प्राइवेट तंत्र का मतलब होता है शोषण | और वहां काम करने वाले, कम्पनी के मालिक के नौकर होते है | जो अपना रोजगार बचाने के लिए उन्ही के आगे पीछे घूमते रहते है | इसका एक कारण ये भी हो सकता है है कि भारत जैसे देश में जनसंख्या ज्यादा होने के साथ साथ रोजगार के काफी कम श्रोत है | गरीबी भी इसका एक कारण हो सकती है | मानवता नाम की चीज बहुत कम बची हुई है और कर्मचारी के लिए कोई अधिकार नहीं होते, उनको जब चाहे कंपनी से निकाल सकते है | उनको जितना चाहे वेतन दे सकते है परन्तु उन्हें इसके खिलाफ बोलने का अधिकार भी नहीं है | अगर वो इतना दुस्साहस करते है तो उन्हें प्रताड़ित किया जाता है | नौकर को ज्यादा घंटे काम करने के लिए मजबूर कर सकते है | इसके अलावा छुटियाँ भी अपने हिसाब से तय कर सकते है | कर्मचारी पूरी तरह से बेबस होता है काम करने के लिए |
सरकारी तंत्र में ये सब नहीं होता है | वहां आप अपने से ऊपर वाले अधिकारी की बात में भी तर्क वितर्क कर सकते है | आपके वेतन में कोई सौदेबाजी नहीं होगी | आपके लिए छुटियाँ निर्धारित है | आपके काम करने के घंटे भी निर्धारित है | आप अपनी जिंदगी ज्यादा अच्छे से जी सकते है | आपको किसी की भी जी हजूरी करने की जरुरत नहीं है | आपको रोजगार से निकालना तो बहुत ही कम मामलों में होता है | वो भी तब जब मामला बहुत गंभीर हो | आप दिमागी तरीके से आजाद रहते हो |
अब सवाल यह है कि इतना अच्छा सुविधा देने वाला तंत्र बदनाम क्यों है ? इसके पीछे कहीं सरकार ही तो नहीं है | सरकारी तंत्र पर इतना भार होता है कम से कम संसाधनों से  तंत्र को चलाना होता है | जितना पैसा तंत्र पर खर्च किया जाना चाहिए उतना नहीं हो पाता है | रिक्तियों को सरकार भरना नहीं चाहती है | सरकारी तंत्र में भी चापलूसी वाला माहौल प्रारम्भ हो चुका है | अगर आप अपने से ऊँचे पद पर बैठे कर्मचारी की चापलूसी करोगे तो आपकी पदोन्नति जल्दी से जल्दी हो जाएगी |  इससे इस तंत्र के कर्मचारियों में विरोधाभाव पनप जाता है और वो एक दूसरे के खिलाफ ही लड़ने लगते है |  वो हमेशा चालबाजियों को सीखने में लग जाते है |  वो एक दूसरे से बात करना तो दूर एक दूसरे को देखना भी नहीं चाहते, जबकि वो एक ही तंत्र का हिस्सा होते है | ये सरकारी तंत्र को ख़त्म करने का सबसे अच्छा तरीका है | ऊपर बैठे लोग सरकार के इशारों से काम करते है | फिर किसको परवाह जनता की क्यूंकि उनके ऊपर तो चापलूसी वाला हाथ होता है | ये विडंबना ही है जो सरकार जनता के लिए होती है है वो ही जनता के इस तंत्र को उन्ही के सामने इस्तेमाल करती है, उसको नष्ट कर देना चाहती है | मतलब सरकारे जनता का भला नहीं चाहती |          

Sunday, December 30, 2018

फिर से ...



डूबा था इश्क में इतना, कि कोई गुजारिश ही न बाक़ी रही |
चाहा था तुझे इतना, कि कोई चाह ही न बाक़ी रही ||

मिला था बहुत सुकून, तेरे इश्क में डूबने का |
पर अब इश्क के नाम से ही, नफ़रत सी हो गयी ||

जलाया था दिल कई दफ़े, बहुत तरह से तूने |
पर अब दिल जलाने की, कोई वज़ह न रह गयी ||

फख्र था तुझको बहुत, कि तुझ पर मर मिटा हूँ मैं |
वो वक्त ही मदहोश था, बस यूही गलतफहमी हो गयी ||

झलकें थे आँसू कई दफ़े, तेरी याद में रह रह कर |
"आज़ाद" इन आँखों में अब, कोई तमन्ना ही न रह गयी ||


Monday, September 12, 2016

अब कहने दे...


आज इन प्यासी आँखों को, देखने दे।
मौहब्बत न सही, इस पल को गुजरने दे॥
ना छुपा चेहरे को, वक्त थम जायेगा मेरा;
उदास है जिंदगी, कुछ पल तो महकने दे॥
तुझे चाह के क्या, कोई गुनाह हो गया?
ना चाह मुझे पर, मुझे तो जी लेने दे॥
धड़कने क्यों बदहाल है, तुझे न देखने से?
मजबूरियाँ होंगी तेरी पर, मुझे तो समलने दे॥
यादों के जख्म सी सीकर, थक गया हूँ मैं।
'आज़ाद' बस तेरे प्यार में, इसको अब कहने दे॥   

Sunday, September 11, 2016

ये दुनिया तुझ में ही...


सिलसिले चलते रहे, और हम जलते रहे।
वो दूर से ही देखकर, मुस्कराते रहे।।
करीब से ना गुजरना था हमे उनके,
हम याद में रोते रहे, और वो बस हँसते रहे॥

निगाहें मिलाने की कीमत, चुकानी थी हमे।
दिले दरिया में डूबने की कीमत, चुकानी थी हमे।
हम उलझ गए थे प्यार के जाल में,
स्वप्न देखने की कीमत, चुकानी थी हमे॥

बहुत किये वायदे हमने, पर हम निभा ना सके।
आँखों से अश्क गिरे, पर उनको बता ना सके॥
दर्द-इ-तन्हाई में जलते रहे, गैरों की तरह;
वो अनजान बनते रहे, और हम कह ना सके॥

तुझे मेरी हकीकत पता है, फिर कुछ बोलती क्यों नही?
मैं गुजर रहा इस दौर से, ये ख़ामोशी तोड़ती क्यों नही?
साँसे जा रही है मेरी, इनको वापिस नही चाहता अब;
'आज़ाद' दुनिया तुझ में ही, जग की रस्मे छोड़ती क्यों नही?

आँखों में नमी होनी चाहिए...


शुष्क है माटी के कण, जल प्रवाह होना चाहिए।
ऊष्ण होते हृदय ग़म पर, अश्रु प्रवाह होना चाहिए॥
ठग लिया जिसको जगत ने, वो चंद साँसे जी रहा;
अपना नही इन्सान के वास्ते, ग़म प्रवाह होना चाहिए॥

भूलते है जो दर्द देकर, सजा उनको होनी चाहिए।
मेरे लिए न सही पर, आँखों में नमी होनी चाहिए॥
अनमोल जिंदगी कतरों पर, पल पल इसे जो लुटा रहा;
करुण रुदन किसी विरही का, इंसानियत भी रोनी चाहिए॥

बिताया वक्त साथ में, वो ख्वाब पूरे होने चाहिए।
तलाशा जिसे रग रग में, वो स्वप्न पूरे होने चाहिए॥
अपनी जिंदगी को उड़ाया, गफ़लत की दुनिया में;
तीर पर आकर खड़ा हूँ, कुछ किनारे तो होने चाहिए॥

डूबता है कोई इश्क में तो, अश्कों की कीमत होनी चाहिए।
प्यार के पवित्र बंधन में, हर दुआ शामिल होनी चाहिए॥
मेरी साँसे तेरी हो गई, ये अहसास तुझे समझना चाहिए;
जिंदगी विरह में दीरघ भई, अंतिम ख़ुशी तो होनी चाहिए॥

ख्वाब टूटे जिस पल में, उस पल को होना ना चाहिए।
फासले बढ़े रिश्तों में, उन रिश्तों को समझना चाहिए॥
वक्त गुजरता है किसी की याद में, क्या तुझे मेरी याद ना आती है?
ये विरह तड़फाता 'आज़ाद' को, क्या प्यार कभी होना ना चाहिए?

Wednesday, October 28, 2015

वक्त


कभी कभी वक्त हमें कमजोर करता चला जाता है । हम वक्त की आँधी में रेत की तरह उड़ते रहते है । हमारे सपने जो हमारे दिलों-जहाँ में बसे थे, वक्त की रफ़्तार में फीके पड़ते जाते है । ऐसा लगता है हमारा अपने ऊपर कोई संतुलन नहीं है । हम कुछ नहीं कर सकते । हम अपनी जिंदगी खो चुके है । हमारी मन:स्थिति निष्किय अवस्था में जा चुकी है । हम दुःख की अंतिम सतह में पहुंच जाते है । जहाँ पहुंचकर हम मौत का इन्तजार करते है । हम थक चुके होते है रोज रोज की कलह से ।
ये दुनिया एक मोहमाया है जिसमे हम सब उलझे हुए है । क्षणिक सुख को हम उत्सव की तरह मनाते है परन्तु क्षणिक दुःख हमसे असहजनीय हो जाता है । हमारे अंदर इतना भी सामर्थ्य नहीं होता की हम उस पल को बुरे स्वप्न की तरह जाने दे । हम सम और विषम परिस्थितियों में एक जैसे तो नहीं रह सकते क्योंकि हम इंसानों की दुनिया में बसते है । क्या हम उन परिस्थितियों में ऐसा कुछ नहीं कर सकते जिससे दुनिया ये ना जान पाये की हम उन हालात से गुजर रहे है ? हम अपनी भड़ास किसी निर्दोष व्यक्ति पर कैसे निकाल सकते है ? क्या हम इंसानियत की हदों को पार करके कुछ पा सकते है ?
दुनिया बहुत बड़ी है और हम अक्सर सोचते है की हमारे पास इतना वक्त नहीं की हम किसी को  व्यक्तिगत तौर पर परखे । क्या ये सही है की किसी तीसरे व्यक्ति के कहने से हम किसी का कुछ अहित करें ? क्या तीसरा व्यक्ति हमेशा सही बोलता है ? क्या तीसरे व्यक्ति का उस अहित में अपना हित नहीं छुपा है ? हममे से ज्यादातर लोग ईश्वर को मानते है, उसके आगे सिर झुकाते है परन्तु हम इंसानों की दुनिया में उन लोगों का अहित सोचते है जो कभी किसी का अहित नहीं सोचते । हम अक्सर उन बातों को ताजा करते रहते है जिन्होंने हमें कभी बहुत दुःख दिए थे । हम जिंदगी को इसी उलझन में निकाल देते है की कब किसने क्या बोला था ? बिन मतलब छोटी छोटी बातों को बड़ा बना देते है । क्या जिंदगी जीने का यहीं एकमात्र तरीका है ?
किसी से बदला लेने से अच्छा उसे बदलना होता है । किसी ने हमारे साथ बुरा किया है तो क्या हम दूसरों के साथ भी वहीँ बर्ताव करें ? वक्त हमेशा चलायमान रहता है और ये भी संभव है की जिसने हमारे साथ बुरा किया वो आने वाले दौर में हमारा परम हितेषी बन जाये । वक्त हर प्राणी की मनोदशा को बदलता रहता है । वक्त किसी का ग़ुलाम नहीं सिवाय कर्मयोगी के । कर्मयोगी वक्त की हर चाल को समझता है और वो सबको अपना ग़ुलाम बना सकता है पर वो  ऐसा नहीं करता । कर्मयोगी संसार की मोहमाया, आशा, तृष्णा, दुःख, सुख, जीवन, मरण, यश, अपयश इत्यादि से अलग हो चुका होता है । क्या ऐसे इन्सान भी धरा पर है ?
जिंदगी जीने का सबका अपना तरीका होता है । परिस्थिति जिंदगी जीने के ढंग को बदल देती है । कुछ जिंदगी को जीते है तो कुछ को जिंदगी जी लेती है । हम सब लघु समय के लिए धरा पर जन्म लेते है पर इस लघु समय में हम दोस्त कम और दुश्मन ज्यादा बनाते है, सिर्फ अपने लघु विचारों से, लघु आकर्षण के लिए, लघु शान शौकत अय्यासी के लिए ।  हमारी विचार धारा इतनी संकुर क्यों होती जा रही है ?

Tuesday, July 21, 2015

तो जानोगे


क्या हाल है मेरा, तेरे से दूर रहकर;
कभी करीब से देखोगे, तो जानोगे ॥
तुम्हे मेरी आँखों में, नमीं नहीं दिखती;
कभी दिल के रास्ते आओ, तो जानोगे ॥
तुम्हे शिकायत मेरे, लब्ज न बोलने से है;
मेरी धड़कन की भाषा समझोगे, तो जानोगे ॥
तुम्हारी जुदाई मुझे, कितना तड़फाती है;
कभी तन्हा रहोगे, तो जानोगे ॥
मैं रिश्तों के बंधन से, कायर हो गया हूँ;
कभी रिश्तों को मानोगे, तो जानोगे ॥
तेरा कहना मुझे बाँहों में, समाया नहीं कभी;
'आज़ाद' वक्त को गुजरने दे, तभी तो जानोगे ॥ 

Saturday, July 18, 2015

बुफे की दावत*

आप माने या न माने,
पर हमारे लिए सबसे बड़ी आफत ।
बुफे की दावत ॥
एक दिन हमें भी, जाना पड़ा बारात में ।
बीबी बच्चे थे साथ में ॥
सभी के सभी बाहर से शो पीस, मगर अंदर से रूखे थे ।
मगर क्या करे भाई साहब, सुबह से भूखे थे ॥
जैसे ही खाने का संदेसा आया हाल में ।
भगदड़ सी मच गयी पंडाल में ॥
एक के ऊपर एक बरसने लगे ।
जिसने झपट लिया तो झपट लिया, बाकी के खड़े तरसने लगे ॥
एक व्यक्ति हाथ में प्लेट लिए, इधर से उधर चक्कर लगा रहा था ।
खाना लेना तो दूर उसे देख भी नहीं पा रहा था ॥
दूसरा
अपनी प्लेट में चावल की तश्तरी झाड़ लाया था ।
उससे तो कही ज्यादा, अपना कुर्ता फाड़ लाया था ॥
तीसरी
एक महिला थी जो ताड़ के वृक्ष की तरह तनी थी ।
उसकी आधी साड़ी तो, पनीर की सब्जी में सनी थी ॥
उसे बार बार धो रही थी ।
पड़ोसिन की पहन कर आई थी, इसलिए रो रही थी ॥
चौथा
बेचारा गरीब था, लाचार था ।
इसलिए कपडे उतार कर, पहले से ही तैयार था ॥
पाँचवा
अकेले ही सारे झटके झेल रहा था ।
भीड़ में घुसने से पहले, डंड पेल रहा था ॥
झठा
कल्पना में ही खाना खा रहा था ।
प्लेट दूसरे की देख रहा था, मुंह अपना चला रहा था ॥
सांतवें
का तो मालिक ही रब था ।
प्लेट तो उसके हाथ में थी, मगर हलवा गायब था ॥
आंठवा
इन हरकतों से बहुत ज्यादा परेशान था ।
इसलिए उसका बीबी बच्चों से ज्यादा, प्लेट पर ध्यान था ॥
नवां
अजीब हरकते कर रहा था ।
खाना खाने की बजाय, अपनी जेबों में भर रहा था ॥
दसवाँ
स्वयं लड़की वाला था, जिसके प्राण कंठ में अड़े थे ।
घराती तो सारे जीम रहे थे, और बाराती बेचारे सडकों पर खड़े थे ॥
अंत में देखते हुए ये हालत ।
हमने पत्नी से कहाँ 'डियर', लौट चले सही सलामत ॥
सुनते ही वो बिगड़ गयी ।
पता नहीं, किस बेफकूफ के पल्ले पड़ गयी ॥
इससे अच्छा तो किसी पहलवान से शादी रचाती ।
तो कम से कम, भूखी तो न मारी जाती ॥
पर इससे शादी रचा के, आज तक अपने आप को कचोट रही हूँ ।
जिंदगी में पहली बार, किसी दावत से बिना कुछ खाए लौट रही हूँ ॥  

Wednesday, July 1, 2015

बस जी रहा हूँ हसरतों को दबाके


मैं दूर तुझसे हो रहा हूँ, सिर्फ तेरी ही ख़ुशी के लिए ।
प्यार तो अब भी है तुझसे, बस जी रहा हूँ हसरतों को दबाके ॥

हर गिरते हुए तारे से, ख़ुशी तेरी ही मांगता हूँ ।
पागल मन अब भी रोता है, बस जी रहा हूँ हसरतों को दबाके ॥ 

शहर की गलियां खाली है, मकानों से कोई आवाज नहीं आती ।
शायद मैं सूनेपन के आगोश में हूँ, बस जी रहा हूँ हसरतों को दबाके ॥

कोई दूर बाग़ में बैठ चहकता है, तो किलकारियाँ मेरी निकलती है ।
सावन में भींगा मौसम नीरस, बस जी रहा हूँ हसरतों को दबाके ॥

अब कोई स्वप्न ना देंखू कभी, नींद को ठुकरा रहा हूँ मैं ।
पर दिन के उजाले में भी स्वप्न है, बस जी रहा हूँ हसरतों को दबाके ॥

गुजरती हवा पास से मेरे, मेरा अंग अंग दुखाती है ।
'आज़ाद' ये प्यार है क्या आखिर? बस जी रहा हूँ हसरतों को दबाके ॥ 

तू समझती क्यों नहीं ?


कहीं तुझे याद करते करते, अपनी जान ना दे दूँ मैं ।
तुझसे प्यार हो गया है मुझे, तू समझती क्यों नहीं ?

और भी है इंसान जहाँ में, तूने आसानी से कह दिया ।
पर उनके लिए आँसू नहीं आँखों में, तू समझती क्यों नहीं ?

माना तेरी मंजिले अलग है, मेरे रास्ते भी जुदा है ।
दूर रहकर तो प्यार और भी बढ़ता है, तू समझती क्यों नहीं ?

जिंदगी का पहला अहसास, इसने मुझे बहुत सताया है ।
ये दर्दमयी तड़फ काटती है मुझे, तू समझती क्यों नहीं ?

मेरी हर सांस में तेरी याद है, इसको कैसे हटाऊँ मैं ?
तेरी याद रोकूँ या अपनी साँस, तू समझती क्यों नहीं ?

ये जिस्म की नुमाइश नहीं है, ये प्यार का घर बना है ।
'आज़ाद' बस तुझमें खो गया है, तू समझती क्यों नहीं ?

Sunday, May 24, 2015

अब कोई ग़म नहीं


ये ब्यार बहती हुई,
मदमस्त सी मदमाती सी ।
धीरे से पास से गुजरती है।
अंग अंग मचलती है ॥
न छू मेरे तन को,
मुझे कुछ कुछ होता है ।
दो पल जीना चाहता हूँ ।
अंगों को शिथिल मत कर ।
बह मेरे से हटकर ॥
ये चिरकाल की तन्हाई ।
क्यूँ मेरे पास आई ॥
बिसरा दूंगा सब ।
पूछना मत कब ॥
चलती सांसे,
धीरे धीरे सुलगती है ।
दर्द-इ-विरह में जलती है ॥
न सोचूंगा उन कमजोर पलों को,
जिन्होंने जिंदगी तबाह कर दी ।
मौत को बुला लिया ।
दीरघ ग़म में सुला दिया ॥
कोई इन वासनाओं को हटाओ ।
मैं इनमे नहीं उलझा था ।
पर मैं तो काफी सुलझा था ॥
छोड़ दी वो बातें,
फिर तेरी याद मेरे पास क्यूँ आई ॥
जिंदगी जीने चला था ।
कुछ ही पल तो रुका था ॥
उन ही में ठगा था ॥
अब सब खामोश क्यूँ है ?
मेरे में ही आगोश क्यूँ है ?
यहाँ कोई नहीं दीख रहा ।
मैं अकेला ही घूम रहा ॥
मैं शून्य में खो रहा ॥
ईश्वर, इन विचारों को रोक ।
आँखें क्यूँ बंद हो गई ?
सांसे भी थम गई ॥
मैं शांति से चिर निद्रा में लीन हूँ ।
'आज़ाद' अब न मैं ग़मगीन हूँ ॥
अब न मैं ग़मगीन हूँ ॥  



Sunday, May 10, 2015

काश हम ये समझते


वो हमारे न थे, हम क्यूँ उन्हें अपना समझते ।
काश हम ये समझते, काश हम ये समझते ॥

वो गुजरे न कभी, जिन रास्तों पर हम टहलते ।
काश हम ये समझते, काश हम ये समझते ॥

वो हारे न कभी, हम जीत के लिए तरसते ।
काश हम ये समझते, काश हम ये समझते ॥

उन्हें जाना था दूर, हम क्यूँ ख्वाब पकड़ते ।
काश हम ये समझते, काश हम ये समझते ॥

वो चाहते भूल जाना, हम क्यूँ उन्हें याद करते ।
काश हम ये समझते, काश हम ये समझते ॥

वो जाने न इस प्यार को, फिर हम क्यूँ तड़फते ।
काश हम ये समझते, काश हम ये समझते ॥

कौन हूँ मैं उनका, वो बार बार ऐसा क्यूँ कहते ।
काश हम ये समझते, काश हम ये समझते ॥

पुष्प खिलते है सब, पर सारे नहीं महकते ।
काश हम ये समझते, काश हम ये समझते ॥

'आज़ाद' दुनिया अच्छी है, जहाँ हम विरह में रहते ।
काश हम ये समझते, काश हम ये समझते ॥

Thursday, May 7, 2015

जीवन का सत्य


हम इंसानों की दुनिया बड़ी विचित्र है । हम ईश्वर की खोज में पता नहीं कहाँ कहाँ तक पहुंच जाते है, पर उस इंसान की कभी पूजा नहीं की जो खुद ईश्वर है । उसने कभी बोला नहीं की वो ईश्वर है । पर उसने कभी किसी का बुरा नहीं किया, शायद सोचा ही नहीं था । हम उस पर विश्वास नहीं करते जो हमारे पास है, हम भागते रहना चाहते है ताउम्र । यहीं तो दुःख की चाल है ।

किसी के मन में क्या चल रहा है जानना मुश्किल होता है । परन्तु हमारे मन में क्या है उस पर हमें गौर करना चाहिए । क्या सही है क्या गलत, हम सबको भलीभांति पता रहता है । कभी भी हमें खुद को ऊँचा साबित नहीं करना चाहिए । क्योंकि ईश्वर की सत्ता को हम कभी नहीं जान सकते । हमें ईश्वर को धन्यवाद देना चाहिए, उसने हम सबको मौत जैसे सुन्दर पल दिए । मौत की यादें हमारी बुराइयों को कम कर सकती है ।

हम जिंदगी की दौड़ में हिस्सा लेते है । कभी कभी वो दौड़ हमारी मौत को बदनाम कर देती है । हमने गलत किया, ऐसा नहीं करना चाहिए था, सोच इंसान को बलबती बनाती है । हर पल हमें ऐसे उसूलों पर काबिज रहना चाहिए । अपने आंतर से मानी हुई गलती क्षमा योग्य होती है ।

किसी पर अटूट विश्वास करना, किसी के खातिर जीना, इंसान की अपनी सोच है । अगर वो सोच नीयत के विरुद्ध नहीं है तो वो महानता है । जो परमत्व से जोड़ सकती है । कुछ क्षण आंतर की बुराई से उपजे पाप, हमारे मन को दूषित कर सकते है । परन्तु हमारे जीवन की लम्बी साधना, उस बुराई को तन तथा मन से दूर करने में सक्षम होती है । हमें किसी की भावनाओं को आहात किये वगैर सत्य के रास्ते पर चलने का हमेशा प्रयत्न करना चाहिए ।

Saturday, May 2, 2015

उफ़ ये जिंदगी


हम खोजते रहे जिंदगी को, जिंदगी हमें धोखा देकर निकल गई ।
हम देखते रह गए रास्तों को, जिंदगी रास्ता बदलकर निकल गई ॥
बड़ी मुश्किल से मनाया था मन, अब के जिंदगी को समझकर रहूँगा ।
ना समझ था ना समझ ही रह गया, अब के तो जिंदगी पूरा मारकर गई ॥

रोते रहे रातभर सोते रहे ख्वाब में, जिंदगी ने ये खेल क्यूँ खेला ?
किसी की चहकती किलकारियों को, चढ़ती ताउम्र तन्हाई में क्यूँ धकेला ?
उस जिंदगी के वास्ते जी रहा था, अब किस जिंदगी के वास्ते जी रहा हूँ ?
क्यूँ तड़फ रहा चिर विलाप में, कल भी था अकेला आज भी हूँ अकेला ?

कुदरत के वास्ते तू रोना मत कभी, जिंदगी के वास्ते कुछ कहना मत कभी ।
ये दर्दमयी संसार उकसाए बार बार, जिंदगी के वास्ते इसमें तू रहना मत कभी ॥
खोजते है अपने से उदास चेहरों को, शायद ये भूलने को हम अकेले रह गए है ।
पर ना ढूँढा उस रहमत को जिसने सिखाया, जिंदगी को फासलों में ढहना मत कभी ॥

ऐ जिंदगी मेरे सवालों के जबाब तो दे, मेरे खालीपन के अहसासों का हिसाब दे ।
अब तो तेरी हर चाल कामयाब हो गई, मेरी शहादत पर दर्द-इ-विरह का खिताब दे ॥
इस जिंदगी ने हर आरज़ू को पल में समेटा, हम थमे नहीं और जिंदगी काट कर गई ।
इन साँसों के बोझ तले जिंदगी दफ़न कर दी, 'आज़ाद' अब कफ़न से हमे नबाज दे ॥

Tuesday, April 21, 2015

अच्छे लोग


कुछ लोग बहुत अच्छे होते है,
तभी तो उनसे लगाव हो जाता है।
जिंदगी तो कट ही जानी है किसी तरह,
पर उनके बिना आँखों में सैलाव हो जाता है॥

चाहते है बार बार भूल जाना उनको,
शायद उनकी ख़ुशी के लिए ही ये करते है।
उनकी यादें उनकी बातें भूल नहीं पा रहा हूँ,
'आज़ाद' ना चाहकर भी उन्हें क्यूँ याद करते है॥

छिपाये थे गम बहुत उनके जाने के बाद,
पर हमको अहसास हो गया हम उन पर मरते है।
लब्जों को तो होठों से सींकर रख लिया था,
पर नैन भी तो दिल की जुवां ब्यान करते है॥

उनकी हरकतें ऐसी, कि उनमे मैं खो गया।
उनकी मधुर आवाज ऐसी, उसमे तो मैं सो गया॥
उनका प्यार से मुस्कुरा के, पीछे से पलट के देखना।
उनके जाने के बाद, मैं तो बस रो गया॥

तक़दीर में जो लिखा है, बस वोही मिलेगा।
प्यार सच्चा हो तो, सारा जहाँ भी खिलेगा॥
 ईश्वर सही सलामत रखे, ऐसे अच्छे लोगों को।
'आज़ाद' की दर्द भरी आहों से, रब भी हिलेगा॥


Sunday, April 19, 2015

वो चला गया


आज मन फिर से उदास हो गया है।
जैसे कोई अपना बिछुड़ गया है॥
जिंदगी ने फिर से ये अनुभव करा दिया है,
बहुत दिनों के बाद, दिल फिर से रो गया है॥

उन बीते पलों को ही, बार बार याद करता हूँ।
नहीं चाहता फिर भी, बार बार मरता हूँ॥
अब ये यादें वो बीते लम्हे, घड़ी घड़ी मारते है,
इन बारिश की बूंदों में भी, दिल-इ-विरह में जलता हूँ॥

मैं चाहता क्या था तेरे से, मुझे नहीं पता।
मैं देखता क्यों था तुझे, मुझे नहीं पता॥
कभी जिंदगी को करीब से, इतना खामोश नहीं देखा था,
मैं पल पल क्यों याद करता हूँ तुझे, मुझे नहीं पता॥

 मैं इतना बदहाल हूँ कि, शब्दों से भी डरने लगा हूँ।
उन शब्दों की ओट में, कुछ का कुछ करने लगा हूँ॥
कहीं ऐसा न हो जाये कि, नफ़रत की बयार में बह जाऊं मैं,
'आज़ाद' प्यार को समझा न कभी, फिर से इसमे क्यूँ मरने लगा हूँ॥