Sunday, April 19, 2015

वो चला गया


आज मन फिर से उदास हो गया है।
जैसे कोई अपना बिछुड़ गया है॥
जिंदगी ने फिर से ये अनुभव करा दिया है,
बहुत दिनों के बाद, दिल फिर से रो गया है॥

उन बीते पलों को ही, बार बार याद करता हूँ।
नहीं चाहता फिर भी, बार बार मरता हूँ॥
अब ये यादें वो बीते लम्हे, घड़ी घड़ी मारते है,
इन बारिश की बूंदों में भी, दिल-इ-विरह में जलता हूँ॥

मैं चाहता क्या था तेरे से, मुझे नहीं पता।
मैं देखता क्यों था तुझे, मुझे नहीं पता॥
कभी जिंदगी को करीब से, इतना खामोश नहीं देखा था,
मैं पल पल क्यों याद करता हूँ तुझे, मुझे नहीं पता॥

 मैं इतना बदहाल हूँ कि, शब्दों से भी डरने लगा हूँ।
उन शब्दों की ओट में, कुछ का कुछ करने लगा हूँ॥
कहीं ऐसा न हो जाये कि, नफ़रत की बयार में बह जाऊं मैं,
'आज़ाद' प्यार को समझा न कभी, फिर से इसमे क्यूँ मरने लगा हूँ॥  

फिर से.....


इस चेहरे पर मुस्कान ना लाया करो,
कहीं प्यार का दरिया दिल में उफन ना जाये।
डरते है आँखों में नमी न आये फिर से,
लब्ज होठों पर आते आते कहीं ख़्वाब दफन ना जाये॥

तेरे दिल की चाह मुझे पता नहीं है,
पर मेरे दिल के अरमान बढ़ गए है।
बेचैनियाँ बढ़ाने की गलती नजदीक से ना करना,
तेरे बिना हम न रहे, हम जिद पर अड़ गए है॥

मान लिया है उनको अपना, जो शायद हमारे न है,
ना देखो अब मुड़कर मुझे, याद बहुत आते हो आप।
फिर से ये वक्त मुझे परेशान कर रहा है,
मैं बिखर जाऊंगा तब, इन सिलसिलों से जाते हो आप॥

कभी करीब से तो देख लो, इन प्यासी आँखों को।
कभी अहसास तो कर लो, इन सुलगते अरमानों को॥
हम जिंदगी की दहलीज पर, खड़े हो गए है शायद,
पहले आना फिर जाना, कहीं तोड़ न दे पैमानों को॥

ना जाना कभी हमें, इस हाल में छोड़कर,
ये हाल भी तो तूने ही बेहाल किया है।
तेरे कहने से बहाये थे गम में अश्क,
'आज़ाद' जिंदगी को तूने, कितना मुश्किल कर दिया है॥  

Wednesday, April 8, 2015

कल वो जायेगा


आजकल बैचेनी का आलम सताने लगा है मुझे।
कल से हो जाऊंगा तन्हा, डर सताने लगा है मुझे॥
तेरी एक मुस्कराहट के लिए, मैं परेशान रहता हूँ,
कल के बाद कैसे रहूँगा मैं, याद आने लगा है मुझे॥

देखते है तेरा रास्ता, शायद उससे तू गुजर जाये ।
बिन कहे लब्जो से, आँखों में कोई बसर जाये॥
कल आँखों में नींद भी ना हो, ना कोई आशा होगी,
डरते है जिस ग़मों की दुनिया से, शायद वो पसर जाये॥

कभी ना चाहा तुझे दुःख दे, इसलिए दूर से देखते रहे हम।
कभी ना जाना था प्यार क्या है, अब अहसास कर गए हम॥
दुआ है मेरी खुदा से, तुम कहीं भी रहो सदा खुश रहो,
ये आँखें तुम्हे देखने की कीमत चुकायेंगी, जब आंसुओं से भींग जायेंगे हम॥

विरह का मतलब ना जाना था कभी, वो भी अब जान चुके।
पल पल तुझे देखे बिना चैन ना मिले, ये भी अब मान चुके॥
दिल तो नहीं चाहता कि तू कभी जाये इन आँखों से दूर,
'आज़ाद' पूछा क्यों ना कभी उसने, क्या मेरे लिए कभी साँस रुके॥

Saturday, November 23, 2013

भारत के विकास में बाधक: अमीरी या गरीबी ?

हम भारतवासी एक विशाल भूखंड पर निवास करते हैं । भारत में उपलब्ध विभिन्न प्रकार के प्राकृतिक स्रोत हमें अपने आप पर ही निर्भर बना सकते है । बहुत सारी नदियों का जल हमें विश्व में कृषि के क्षेत्र में अग्रसर बनाये हुए है । तरह-तरह की वेशभूषा, रहन-सहन, भाषा, जलवायु इस देश के महत्त्व को और भी बढ़ा देती है । इन सबसे ऊपर हमारा लोकतान्त्रिक संविधान विश्व में अलग पहचान बनाये हुए है । परन्तु आज़ादी के इतने सालों  बाद भी हम दूसरे विकसित देशों की तरह विश्व में अपनी अलग धाक नहीं जमा पाये है । आज भी हम विश्व के नामी-गिरामी देशों के आगे अपने को बेबस और मजबूर देखते है । आखिर इसके पीछे कौन जिम्मेदार है ?  
भारत एक लोकतान्त्रिक देश तो है परन्तु सही मायनों में यहाँ लोकतंत्र का उपयोग नहीं हो पा रहा है । शासित लोग ही इस देश को विश्व का आदर्श शक्तिशाली देश बना सकते है ।भारत में जगह-जगह नक्सलवाद, माओवाद, जातिवाद, और धर्म के नाम पर होने वाली लड़ाईयां ये प्रदर्शित करती है कि देश का भविष्य गर्त कि तरफ जा रहा है और सरकारों की मानसिकता इसे आसान करती जा रही है । सही कानूनों का सख्ती के साथ पालन नहीं हो रहा है । सरकारों की राजनीति, लोगों को एक-दूसरे से नफ़रत की तरफ ठकेल रही है और उनमें "पहले भारतीय" का अहसास कम होता जा रहा है । इसी के परिणामस्वरूप लोग अब सिर्फ अपने और अपनों के फायदों के बारे में ही सोचते है ।
भारत में आर्थिक स्थिति के हिसाब से दो वर्गों का उत्थान हो चुका है, अमीरी तथा गरीबी ।  जहां भारतीय विश्व में अमीरी में अच्छे स्थान पर आते है वहीं गरीबी भी एक चिंताजनक स्थान पर है । इन दोनों के बींच का लम्बा फासला सरकार की कमजोरी को उजागर करता है । अवैध तरीकों से दूसरे देशों में छिपाया गया धन लोगों के मन से भारतीयता को हटा देता है । अगर उन अमीर लोगों की मानसिकता को बदला जा सके तो वो धन देश को काफी आगे ले जा सकता है । गरीबी में लोगों का दो वक्त के खाने का संघर्ष, देश के लिए कुछ ना कर पाने की मजबूरी है । आखिर उन्हें जिंदगी को आगे तो बढ़ाना है । हिंदी में एक कहावत प्रसिद्द है कि "भूखे पेट भजन होये ना गोपाला" । इसका शाब्दिक मतलब है कि जब तक इन्सान की प्रमुख जरूरतें पूरी नहीं हो जाती तब तक उसकी प्राथमिकता देश विकास नहीं अपनी जरुरत ही होगी ।
एक लोकतांत्रिक क्षेत्र-विशेष या देश के निर्माण का उद्देश्य भी यहीं होता है कि देश की परिधि में रहने वाले सभी लोगों के हितों की रक्षा की जाये । अन्यथा राजा-महाराजाओं वाले शासन से हम कैसे अलग है ?  इसके लिए संविधान ने न्यायलयों कि स्थापना की। पर लगता है वो पुराना राजाओं वाला शासन आज भी है बस उसे अलग तरह से परिभाषित कर दिया गया है । जैसे राजा लोगों को उपहार देकर खुश कर देते थे वैसे ही आज अमीर वर्ग धन से नियमों के साथ खिलबाड़ कर रहे है । अदालतों में सजा अपराधियों की असल मृत्यु के बाद तक सुनाई जाती है । निर्दोष लोगों को जबर्दस्ती फंसा कर मानवता का उपहास किया जा रहा है ।
अमीरों का उद्देश्य "मैं ही, बस मैं ही रहूँ" रहता है । अमीर नहीं चाहते कि आज का कोई गरीब कल को  उनके साथ बराबर में खड़ा हो । अतः वो हर कुटिल चाल से गरीबों को आगे बढ़ने से रोकता है । सरकार में भी इसी तरह के लोगों का बोलवाला होता है और वो सिर्फ अपनी मनमर्जी करते है । इसीलिए भारत के शिक्षित युवा विदेशों में चले जाते है क्योंकि उनको यहाँ उनके अनुरूप नौकरी नहीं मिल पाती ।  और उनका भारत भविष्य में योगदान नगण्य हो जाता है । ये सब अपनी लोकतान्त्रिक सरकार का भ्रष्टाचार के आगे नतमस्तक हो जाना दिखाता है ।
  

Tuesday, June 11, 2013

विरह मे…

तेरी शरारत मुझे जीने न दे,
क्योंकि तेरी नज़रों में मेरा आशियाना हो गया है ।
मेरे होठों से लब्ज निकले या न निकले,
पर दिल मेरा भी तो सयाना हो गया है ॥
तुझे मैं कैसे न पसंद करूँ ?
तूने ख्यालों में मेरे घर बना तो लिया ।
तूने कहा न पसंद करती है मुझे,
 पर इशारों ने तेरे सच बता तो दिया ॥
तेरा चुपके से धीरे से मेरे तन को दबाना,
'आज़ाद' के भावुक हृदय में, प्रेम का दीप जला तो दिया ॥