Saturday, November 12, 2011

प्रजातंत्र के रखवाले


जिनके घरो में दीपक नहीं
नहीं तेल और बाती
वो राह दिखाते भटको को
बने आज खैराती
प्रजातंत्र के रखवाले
पीते निसदिन खून
भरे तिजोरी आपनी
बस छाया यही जूनून

लम्बे लम्बे वायदे काफी 
एक भी न पूरा होता है 
क्या राजनीति मेरे देश की!
बिना रिश्वत, सब अधूरा होता है
हो उद्धार देश का कैसे
जटिल बना है यही सवाल
जिसके हाथ कमान है
उसे तनिक ना ख्याल
 
आखिर कब तक झेलेंगे हम
पाप, अन्याय, भ्रष्टाचार को
क्यों बने है कायर से हम
लानत हमारे विचार को
जाग जा रे मानव अब
छोड़ रंगमय ये बसेरा
'आज़ाद' आवाहन बस एक
हो जग में कभी अँधेरा

Tuesday, October 25, 2011

एँ बरसते मेघ , ना भीगा मेरे तन को

एँ बरसते मेघ , ना भीगा मेरे तन को 
क्यों ये आग सी लगी है , मेरे मन को 

मैं अभागा हूँ पर , कौतुहल है सबको 
मेरी पीर में मजा आया , मेरे रब को

क्यों खामोश जी रहा हूँ , मैं क्षण क्षण को 
एँ बरसते मेघ , ना भीगा मेरे तन को 

मुझे तो लूट लिया, किसी के शबाब  ने 
उसके मस्त नैन ने , उसके हाव भाव ने 

दूर था पर, मिला दिया उसकी छाव ने 
मुझ 'आज़ाद' को विवश किया , उसकी चाव ने 

मैं तो उठ चल दिया , विरह के वन को 
एँ बरसते मेघ , ना भीगा मेरे तन को 

Saturday, October 22, 2011

विरह में...

 सुबह की शांत सोच भी , मुझको कलहन दे रही है 
दूर रहकर अन्तः आवाज ही , मुझको कसकन दे रही है 
उसे भूलना जरुरी हो गया है , मगर भूल नहीं पा रहा हूँ 
जिन्दगी में विरह की पीड़ा , वो मुझे छन छन  दे रही है 

मैं जिन्दगी को जी रहा हूँ , या मौत से लड़ रहा हूँ मैं
बेसहारा बना इस विरह में , मुंह ढककर रो रहा हूँ मैं
कोई नहीं मेरा एस जगत में , सिर्फ और सिर्फ उसके बिना
फिर भी मैं पौरष दिखला रहा , पर कायरो सा मर रहा हूँ मैं

छिटक रहे है मेरे अश्क , जग की हर सुनसान राह पर
नैनो में बारिश या अश्को में नैन , प्रीत का मेघ छाह पर 
मन में उजसी तीव्र चपला , मेरे हृदय को जला देती है 
पर विरह जल जल कर बढता , मौत भी चुप उसकी चाह पर 

मेरे शुष्क मरुथल मन में , एक वो ही तो रहते है 
बिन कहे अभोगिन अश्को से , पल पल कुछ कहते है 
घुट घुट कर मैं तो जी उढ़ी , तेरी विरह दशा पर 
बंद पलके कर, मौन तोड़, जो तुम भी हम भी सहते है

तुम क्यों कैद हो उस अतीत में , जो शायद हमारे अपने न थे 
तुम क्यों डूबे मूक स्वप्न में , वो स्वप्न प्यारे सपने न थे 
जग की मान मर्यादाओं ने , कुसुम सा चितवन उजाड़ा था 
'आज़ाद' रमणीय स्वच्छ प्रेम में , हम दोनों तपने न थे

Saturday, October 1, 2011

यही तो अफसोस है मुझे

इस दुनिया का क्या है ? ये तो कुछ भी समझ लेती है
पर प्रिये ! तुमने ना समझा , 
यही तो अफसोस है मुझे.

साथ रहना चाहा हरवक्त तुम्हारे, वो चंद लम्हे मेरे अहम थे 
पर उन चंद लम्हों ने, दिल में तुम्हारे, ख्वाब ना पलाया 
यही तो अफसोस है मुझे.

तुम्हारी हंसी का कायल था मैं, तुम्हारे गम में आंसू मेरे बहे थे
पर आज, वक्त के कदमो से डरकर, तूने मुझे भुला दिया
यही तो अफसोस है मुझे.

"मैं तुम्हारी हूँ" तुमने क्यों कहा था ? मैं सच समझ बैठा
तुम्हारे भोलेपन की आहों में, मैं दरिया सा बह गया 
यही तो अफसोस है मुझे.

मैं जा रहा था बहुत दूर, मंजिल का मुझे पता नहीं
आगे पथ सुनसान तो क्या, पर तू मुझसे अंजान हुई 
यही तो अफसोस है मुझे.

तेरी नजरो से बंधा था मैं, जाने क्यों ? पता नहीं
पर तेरी नजरे, तो मेरी नजरो से, कभी मिली ही नहीं
यही तो अफसोस है मुझे.

तेरी मूरत मेरे अन्तः में बसी, दिन रात उसको संवारता था मैं
मेरे नयनो की बारिश, नहलाती उसे हमेशा, पर तेरी पलकें भींगी नहीं
यही तो अफसोस है मुझे.

'आज़ाद' बैचेन घड़ी में घिर गया, तेरी ख़ामोशी ना टूटे, यही इन्तजार था
पर तेरे, अब तक के खामोश लब्ज, कुछ बोल गए
यही तो अफसोस है मुझे.    

Tuesday, September 13, 2011

मैं तो हो चला हूँ दीवाना

मैं तो हो चला हूँ दीवाना
मैं तो हो चला हूँ दीवाना

तुम्हारा बार बार, मेरे पास आना
आकर के हृदय को, जला जाना
यादों में हंसी ही, याद आना
मेरी मदहोशी, को भी, छू जाना

अपने लब्जो को, होंठो से छिपाना
मैं तो हो चला हूँ दीवाना
रह रह कर, मुझसे बातें करना
ना मन, फिर भी, मुझसे है पढना

बिना काम हमेशा, मेरे साथ चलना
मेरी नादानी पर, गुस्से से चढ़ना
वो बहुत करीब से, हाथ मिलाना
मैं तो हो चला हूँ दीवाना

वो पल पल, मुझे ही, निहारते रहना
कुछ कहने की, हमेशा, कोशिश करना
व्याकुल हमेशा, हर पल जो रहना 
गम ही  गम, शायद, दर्द जो सहना

वो होले से मेरे, दिल को हिलाना
मैं तो हो चला हूँ दीवाना
कभी बक बक, तो कभी, चुप हो जाना
कभी हंसी चेहरा, तो कभी रुलाना

बिछुड़ते जब हम, कभी था रो जाना
पूछा हमेशा, कुछ नहीं, मुझे होगा जाना
वो अजीब ढंग से, दर्दो को सिलाना
मैं तो हो चला हूँ दीवाना

वो शर्म की डोरी में, बंधी होगी शायद
मेरी ख़ुशी हमेशा, चाहती होगी शायद
मिलकर बिछुड़े ना, डरती थी शायद
मेरे जबाब पर, शक करती थी शायद

अपने मासूम नैनो का, गूंठ  पिलाना
मैं तो हो चला हूँ दीवाना
रात भर सोचता रहा, जागता रहा मैं
उसको दिल के आईने से, झांखता रहा मैं

रब उसको ख़ुशी दे, मांगता रहा मैं
उसकी पीड़ा ख्यालों में, दहलता रहा मैं
उसके दर्दो से, मेरा चिल्लाना
मैं तो हो चला हूँ दीवाना

मिली जब, मैंने पूछ ही लिया अब
दिल में कुछ तुम्हारे, ठीक नहीं सब?
खामोश रही पर, पलके भींगी थी तब
उसके मासूम अश्क, मुझको छुए थे जब
'आज़ाद' विरह में, अब उसका सताना

मैं तो हो चला हूँ दीवाना