Sunday, March 25, 2012

आह! ये विरह

 उसके कुमदिनी मुखमंडल की, आभा में खोया हूँ
उसके सिर से सटा सिर, स्वप्नों में सोया हूँ
उसकी बातों के जादुई नशे में गुमसुम हुआ
रजनी दिवस सारी, गुमसुम सा ही रोया हूँ

प्रेम विरह के जंजाल में, फंस गया हूँ मैं
उस तन के हावभाव में, कंस गया हूँ मैं
उड़ते हुए मेघो को पकड़ रहा हूँ मैं
बिन बात झुलस से, हंस रहा हूँ मैं

पवन की चाल को मात देती हुई, आती है जाती है
यादें उसकी मुझे, पल पल रुलाती है
अपनी हालत को देख खुद आंसू बहा रहा हूँ
वक्त ठहर जा वहां, जहाँ वह कुछ गुनगुनाती है

खामोश नजारों में कोई, आवाज नहीं आती
प्रिये! प्रिये! क्या तुम्हे मेरी आवाज, अब नहीं भाती
ऐ जगत के पदार्थो तुम तो मेरा साथ दे दो अब
विरह के दर्द से ऊबा मैं, अपने में समेत ले री माती

छिटक गए है मोती आँखों के सारे, इस धरा पर
क्यों तन को विरह में लपेटे, मैं खड़ा धरा पर
हे चैतन्य अविनाशी, अद्वितीय, तेरी माया अलौकिक है
'आज़ाद' वक्त के कदमो तले जीवन में, मरा पर
      

Monday, January 30, 2012

जागो युवाओं

अमर शहीद, सर कटा के गए थे वतन के लिए 
और हम, सर झुका से लिए है वतन के लिए
देखो सर उढ़ा के, आज़ादी के लिए मेरा वतन अब भी रो रहा है
जागो युवाओं, मेरा देश सो रहा है

हर तरफ अन्याय है, पाप है, हा हाकार है
कहीं बदला, कहीं हार, तो कहीं मार है
आज़ादी आयी तो बस, कुछ ही जनों के लिए
बाकी सब गुलाम है, पैदा हुए गुलामी के लिए
औरों के लिए कानून, उनके लिए सब हो रहा है
जागो युवाओं, मेरा देश सो रहा है

संविधान बनाया, समानता के वेश का
वो ही पर्याय बन गया, राग-विहाग-विद्वेष का
सज्जन को रोटी नहीं, अपराधी मलाई खा रहा है
'आज़ाद' देश का भविष्य, जाने कहाँ जा रहा है?
आज़ादी का मतलब, मेरा देश खो रहा है
जागो युवाओं, मेरा देश सो रहा है

याद करो कुछ, अमर शहीदों के बलिदान को
न्योछावर किये प्राण, सलाम उनके मान सम्मान को
एक धीमी सी गुलामी, हमें कसती जा रही है
स्वप्नों में अब आज़ादी, हकीकत में दूर जा रही है
'आज़ाद' सोच कुछ पल, ऐसा क्यों हो रहा है
जागो युवाओं, मेरा देश सो रहा है    

Saturday, January 14, 2012

व्याकुलता

बंद कोहरे की चादर में,
घने पत्तों की ओट में |
क्षितिज के उस पार,
कड़कडाती बिजली के आवेश में,
एक धीमी सी आवाज सुनाई देती है|
शायद निर्लज्ज वाटिका उसे दुःख देती है||
खाली पड़े बंद पटो के अन्दर|
उमंग बल खाती हुई |
बहकती हुई चहकती हुई|
सूनेपन से तड़पती हुई||
अधखुले अधरों से लय में,
जीवंत स्वप्नों को ताक पे रख,
गाती है करुण हृदय बन|
दीपक की लौ को निहारती हुई,
हराती है उसे अपने तेज से|
हाथो को बंद कर लौ के ऊपर,
जलती है इत्मिनान से||
शायद तपने के गुबार से||
लौ को हराने की चाह में|
नरभक्षी बाघिन की राह पे||
कभी चलती है कभी रूकती है|
यौवन की लू जो चलती है||
संभलना उसे आता नहीं|
रुकना उसे भाता नहीं,
हर दिशा में कदम बढते है||
शायद पूस की कपकपाती सर्द,
जगने को मजबूर कर रही है|
उसके व्याकुल यौवन को,
पीड़ा में धकेल रही है||
वो हंसती है और रोती है,
ये तो वक्त के आगोश में
कोई चादर ताने सोता है|
पता नहीं सोता है या सोचता है||
बंद पलको के अन्दर भी,
न सोया न नींद आई|
वो रहस्यमयी चुभन,
आ जा कर पास आई||
बदलती करवटें भी खामोश हो जाती है|
पर उफ़ तक ना करती है||
वो मूक नजाकत भी सजा देती है|
चिल्लाने पे भी सजा मिलती है||
'आज़ाद' वक्त के कदम नहीं रुकते,
तभी तो जिन्दगी, कभी सजा तो कभी मजा लगती है||      

Saturday, December 31, 2011

अजमाना चाहता था


 मेरी आँखें भींगी थी, उसकी आँखें भी भिगाना चाहता था
तड़फ में झुलस रहा था मैं, उसको भी रुलाना चाहता था
बस एक ही बात उढ़ी जेहन में, क्या वो भी मुझे इतना चाहती है?
मैं तप गया था चंद विरह में, क्या वो भी? अजमाना चाहता था

अपने को उससे अलग किया , झूठमूठ, अजमाना जो था
हर बात पे उनकी, गुस्सा मेरा, झूठमूठ, सताना जो था
सकपका कर वो, रह गयी थी उस रोज
अब तो मेरी हर बात सही, शायद झूठमूठ, मनाना जो था

मैंने दर्द तो बहुत दिए, पर वो उनको छुपा लिए
मैंने जख्म तो बहुत किये, पर वो भी सिला लिए
हर बात पे आग लगायी, मैंने बस उनके लिए
पर! वो हर आहत पे, राहत से मुस्करा लिए

भूलाये ख्वाब सारे उनसे, उन्होंने अपने सब बना लिए
मिटाए हर पल संग के, हर क्षण उन्होंने सजा लिए
हर याद उनकी मैंने, स्वप्न में दफ़न कर दी
पर अब नींद भी, स्वप्न भी, गायब! और रातें, घुट घुट कर जिए

सजा देना चाहा उन्हें, खुद सजा मिल गयी
हृदय के भावुक भाग में, मूर्त उनकी जम गयी
बार बार अपने को ही कोसता रहा मैं, सारा समय
वो आयी, बंद होंठ थे, दिल को छूकर गयी

उनके चेहरे की भाव भंगनाएं, मुझको दुःख दे रही थी
उनकी बिन कही आवाज, मुझे सुनाई दे रही थी
वो मुड़ी, वापस आई, सीने से लग रो गयी
'आज़ाद' मेरी अजमाइश के जबाब, उसके हृदय की धड़कन दे रही थी  

Monday, December 19, 2011

अन्तःद्वंद

ये कैसी उहापोह मेरे अन्तः में
क्यों इसके आगे मैं झुक जाऊ
क्यों बदल रही है पवन रास्ते
क्या मैं धूल आंधियो से रुक जाऊ

क्यों डूब रहा बीते अतीत में
कैसे उन कष्टों से मैं मुकर जाऊ
ऐ दुनिया दे इतनी नुफरत मुझे
कि मैं काँटों से भी गुजर जाऊ

जो थम गया वक्त के कदमो में
उस कायर को क्या नाम दू
जो गिर गिर के चलता रहे
उसे हृदय का स्नेह वार दू

जो थमे नहीं चट्टानों से भी 
उन्हें जीवन की हर हंसी बहार दू
ऐ ज़माना, रो इस कदर तू
मैं विपत्तियों को हटा, नया संसार दू
................................................

जब पीड़ा से सना सागर भी
लहरों को किनारों पे धोता है
बढ़ रहा नीर उसके अन्शुओ से
जब आप आप ही रोता है

कैसा दुःख कैसी मुसीबत
जिस चिर वेदना में तू खोता है
भूल जा जो हुआ होने वाला
ये जग तो स्वार्थ का झरोंता है

बढ़ता रह मुसाफिर आगे
परवाह न कर दुनिया की ज़रा
जो छूट जाये अपने भी तो  क्या
जा उस ओर जहाँ पौरुष भरा

वो कदम तुझको रोकेंगे नहीं
भर देंगे वीरत्व ना अफ़सोस ज़रा
खुद में डूब जा इतना ओ राही
ना सुन क्या बुरा क्या खरा
....................................................
झड़ते है आंसू  किसी की आँखों से
तो दिल मेरा क्यों रोता है
गरीब बेसहारो का खा खा कर
कोई सुख  से महलों में सोता है

ये उसकी किस्मत ये मेरी है
दिन रात इसी में क्यों खोता है
उठ चल भर कर नैनो में रुधिर
क्या तेरे तन कुछ ना होता है

जब चाहता गुलामी करना तू
क्यों आजादी का नारा लगाता है
क्यों भूल रहा तू स्वम में है
बेवक्त वेबुनियाद जब चिल्लाता है

चींख चींख कर गला रुंध गया
भुजाओ को क्यों नहीं अजमाता है
खोल ले सीने के हर जख्म को
जो हर पल तेरे को काटता है
..............................................

न जा उस दर पे कभी
जो देने का एलान हमेशा करते है
अगर गया तो फंस गया
वो फंसाने के लिए ही तो कहते है

दिखला दे उन काफ़िरो को तू 
कैसे ज्वाला से घर जलते है
लगा दे आग उनके महलों को
जो चैन से ना खाने देते है

जब लाज लगी हो दांव पे
बसन भी कोई ना छोड़ता है
जब चार दिन का भूखा मानुष
रो रो के दम तोड़ता है

क्या तुम्हारी हुकूमत इतनी है
अमीरों के आगे हाथ जोड़ता है
ले ले अपने अधिकार तू सारे 
'आज़ाद' तो लहू में पोंड़ता है